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असम विधानसभा में UCC विधेयक पास, अमित शाह ने जनता को दी बधाई

उत्तराखंड और गुजरात के बाद असम बना तीसरा राज्य, भारी हंगामे के बीच विधानसभा से पारित हुआ बिल

गुवाहाटी ( शिखर दर्शन ) // असम विधानसभा में बुधवार को समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) विधेयक पारित कर दिया गया। इसके साथ ही असम, उत्तराखंड और गुजरात के बाद ऐसा करने वाला देश का तीसरा राज्य बन गया है। इस विधेयक का उद्देश्य धर्म से ऊपर उठकर विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और सह-जीवनसाथी संबंधों के लिए एक समान कानूनी व्यवस्था लागू करना है।

अमित शाह ने दी बधाई

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने असम की जनता को बधाई देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा शासित राज्य सरकारें हर नागरिक के लिए समान कानून लागू करने की दिशा में काम कर रही हैं। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड और गुजरात के बाद अब असम ने भी UCC विधेयक पारित कर नया उदाहरण पेश किया है।

भारी हंगामे के बीच पारित हुआ विधेयक

मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की सरकार ने विधानसभा सत्र के अंतिम दिन भारी हंगामे के बीच इस विधेयक को मंजूरी दिलाई। विपक्षी दलों ने बिल को व्यापक चर्चा और परामर्श के लिए सेलेक्ट कमेटी के पास भेजने की मांग की थी, लेकिन विधानसभा अध्यक्ष रणजीत कुमार दास ने इस मांग को खारिज कर दिया।

दिनभर चली चर्चा के बाद अध्यक्ष रणजीत कुमार दास ने मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा से विधेयक को पारित करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाने को कहा। सत्तापक्ष के सदस्यों द्वारा बिल के समर्थन में मतदान किए जाने के बाद अध्यक्ष ने विधेयक पारित होने की घोषणा की। इसके बाद सदन में तालियां बजाकर फैसले का स्वागत किया गया।

बहुविवाह पर रोक और रजिस्ट्रेशन अनिवार्य

नए UCC विधेयक में बहुविवाह पर पूरी तरह रोक लगाने का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा सह-जीवनसाथी संबंधों के पंजीकरण को भी अनिवार्य बनाया गया है। बिल के अनुसार पुरुषों की विवाह योग्य आयु 21 वर्ष और महिलाओं की 18 वर्ष तय की गई है।

विधेयक में यह भी प्रावधान किया गया है कि विवाह और तलाक दोनों का सरकारी पंजीकरण अनिवार्य होगा। हालांकि अनुसूचित जनजाति समुदाय के लोगों को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है।

विपक्ष ने जताई आपत्ति

विपक्षी दलों ने विधेयक को जल्दबाजी में पारित करने का आरोप लगाते हुए इसे प्रवर समिति के पास भेजने की मांग की थी। उनका कहना था कि इतने महत्वपूर्ण कानून पर व्यापक चर्चा और सामाजिक परामर्श जरूरी है। हालांकि सरकार ने इसे समान नागरिक अधिकारों की दिशा में बड़ा कदम बताते हुए सदन से पारित करा लिया।

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