दिल्ली

धर्म परिवर्तन के बाद पुराने जातिगत दर्जे के आधार पर नहीं मिलेगा आरक्षण, सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

धर्म परिवर्तन के बाद अपनी पुरानी जाति या सामाजिक श्रेणी के आधार पर आरक्षण का दावा करने से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि हिंदू सामाजिक व्यवस्था से दूसरे धर्म में जाने वाला व्यक्ति केवल अपनी पूर्व जाति के आधार पर नए धर्म की किसी अधिसूचित पिछड़ा वर्ग श्रेणी में आरक्षण का हकदार नहीं बन जाता। हालांकि, फैसले का संदर्भ और आरक्षण की अलग-अलग श्रेणियों पर लागू कानूनी नियम समझना जरूरी है।

नई दिल्ली ( शिखर दर्शन ) //

तमिलनाडु सरकार के आदेश से जुड़ा था मामला

यह मामला तमिलनाडु सरकार के 9 मार्च 2024 के आदेश से जुड़ा था। इस आदेश के तहत पिछड़ा वर्ग (BC), अति पिछड़ा वर्ग (MBC), विमुक्त समुदायों और अनुसूचित जाति (SC) से आने वाले कुछ लोगों को इस्लाम अपनाने के बाद पिछड़ा वर्ग मुस्लिम (BC Muslim) श्रेणी में शामिल कर आरक्षण का लाभ देने की व्यवस्था की गई थी।

मद्रास हाई कोर्ट ने 25 जून 2026 को इस सरकारी आदेश को निरस्त कर दिया था। तमिलनाडु सरकार ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन 15 अक्टूबर 2026 को न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने सरकार की याचिका खारिज कर दी और हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।

पुराने जातिगत दर्जे को नए धर्म की श्रेणी में अपने आप नहीं जोड़ा जा सकता

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, किसी व्यक्ति का पहले किसी पिछड़े वर्ग या जाति से संबंधित होना अपने आप उसे दूसरे धर्म की अधिसूचित पिछड़ा वर्ग श्रेणी का सदस्य नहीं बना देता। नए धर्म में संबंधित समुदाय की सदस्यता और आरक्षण की पात्रता के लिए आवश्यक सामाजिक तथा कानूनी आधार होना चाहिए।

अदालत ने कहा कि पहले की सामाजिक व्यवस्था में रही पिछड़ेपन की स्थिति को केवल धर्म परिवर्तन के आधार पर नए धर्म की किसी दूसरी अधिसूचित पिछड़ा वर्ग श्रेणी में स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। इसलिए केवल इस्लाम अपनाने के आधार पर किसी व्यक्ति को तमिलनाडु की पिछड़ा वर्ग मुस्लिम श्रेणी का सदस्य मानना पर्याप्त नहीं है।

अनुसूचित जाति के आरक्षण पर क्या है संवैधानिक प्रावधान?

अनुसूचित जाति (SC) के मामले में संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के तहत अलग प्रावधान है। इसके पैरा 3 के अनुसार, हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को मानने वाला व्यक्ति अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाता। इस कारण इस्लाम या ईसाई धर्म अपनाने वाले व्यक्ति को केवल अपनी जन्मजात जाति के आधार पर अनुसूचित जाति का दर्जा और उससे जुड़े आरक्षण का लाभ जारी नहीं रहता।

हालांकि, अनुसूचित जनजाति (ST) की पात्रता के नियम अलग हैं। अनुसूचित जाति की तरह धर्म के आधार पर अनुसूचित जनजाति के दर्जे पर वही स्वतः लागू प्रतिबंध नहीं है। ऐसे मामलों में संबंधित जनजातीय पहचान, परंपराओं और समुदाय से जुड़े तथ्यों को ध्यान में रखना पड़ता है।

फैसले का वास्तविक अर्थ क्या है ?

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला तमिलनाडु में धर्म परिवर्तन के बाद पिछड़ा वर्ग मुस्लिम श्रेणी के तहत आरक्षण पाने से जुड़े विवाद पर आया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि हर धर्म परिवर्तन के बाद हर प्रकार का आरक्षण एक ही नियम से समाप्त हो जाता है। आरक्षण की पात्रता संबंधित संवैधानिक प्रावधानों, अधिसूचित समुदायों और लागू कानूनों के आधार पर तय होती है।

इस फैसले से स्पष्ट हुआ है कि केवल पुरानी जाति का हवाला देकर धर्म परिवर्तन के बाद किसी दूसरी अधिसूचित पिछड़ा वर्ग श्रेणी में आरक्षण का दावा नहीं किया जा सकता।

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
Don`t copy text!