दिल्ली

मतदाता सूची विवाद के बीच चुनाव आयोग ने बदले कई नियम, फॉर्म-7 से लेकर दस्तावेजों की जांच तक अहम बदलाव

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर जारी विवाद के बीच चुनाव आयोग ने आवेदन, आपत्तियों और मतदाताओं के दस्तावेजों के सत्यापन से जुड़ी प्रक्रियाओं में बदलाव किए हैं। फॉर्म-7 के जरिए नाम हटाने की मांग पर सीमा तय करने से लेकर मतदाताओं को दस्तावेज जुटाने में मदद देने तक कई कदम उठाए गए हैं। दिल्ली में लाखों मामलों के निपटारे के लिए विशेष अभियान भी चलाया जा रहा है। इन फैसलों के बीच मतदाता सूची की शुद्धता और पात्र नागरिकों के मतदान अधिकारों को लेकर बहस जारी है।

नई दिल्ली ( शिखर दर्शन ) //

मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर विपक्षी दलों के विरोध और विभिन्न स्तरों पर उठ रहे सवालों के बीच चुनाव आयोग की प्रक्रियाओं में किए गए बदलाव चर्चा में हैं। आयोग का जोर पात्र मतदाताओं को सूची में शामिल करने, दस्तावेजी प्रक्रिया को आसान बनाने और नाम हटाने से जुड़ी आपत्तियों के दुरुपयोग को रोकने पर है।

हालांकि, इन बदलावों को सीधे तौर पर आयोग का पांच फैसलों से पीछे हटना कहना उचित नहीं होगा। अलग-अलग मामलों में किए गए प्रक्रियागत बदलावों और उनके कारणों को समझना जरूरी है।

पश्चिम बंगाल में पात्र मतदाताओं की मदद पर जोर

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान छूटे पात्र लोगों की समस्याओं के समाधान के लिए विशेष अभियान चलाने की जानकारी सामने आई है। जिला निर्वाचन अधिकारियों को शिविरों के माध्यम से मतदाताओं की सहायता करने और उनके दस्तावेजों से जुड़ी समस्याओं का समाधान करने पर जोर दिया गया है।

इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पात्र नागरिक केवल दस्तावेजी या प्रक्रियागत दिक्कतों के कारण मतदाता सूची से बाहर न रह जाएं।

दिल्ली में 33 लाख मामलों में से 20 लाख का निपटारा

दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान करीब 33 लाख प्रविष्टियों में तार्किक विसंगतियां या पुराने मतदाता रिकॉर्ड से मिलान नहीं होने जैसी समस्याएं सामने आई थीं। दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के अनुसार, इनमें से लगभग 20 लाख मामलों का समाधान किया जा चुका है। शेष मामलों पर भी कार्रवाई जारी है।

मतदाताओं को अपने रिकॉर्ड में गड़बड़ी या दस्तावेजों से जुड़ी समस्या होने पर बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) और संबंधित निर्वाचन अधिकारियों से संपर्क करने की सलाह दी गई है।

फॉर्म-6 के साथ अतिरिक्त घोषणापत्र पर उठा विवाद

नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 के साथ अतिरिक्त घोषणापत्र जोड़े जाने को लेकर भी विवाद सामने आया। उपलब्ध विवरण के अनुसार, मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने संशोधित फॉर्म-6 को मंजूरी नहीं दी थी।

इसके बाद कुछ राज्यों में संबंधित अतिरिक्त घोषणापत्र को ऑनलाइन पोर्टल से हटाए जाने की जानकारी सामने आई। इस मामले में बदलाव की परिस्थितियों और लागू नियमों को लेकर आधिकारिक स्थिति को ध्यान में रखना जरूरी है।

फॉर्म-7 पर सीमा, थोक में आपत्तियां दाखिल करना होगा मुश्किल

मतदाता सूची से किसी का नाम हटाने या किसी प्रविष्टि पर आपत्ति दर्ज कराने के लिए फॉर्म-7 का इस्तेमाल किया जाता है। चुनाव आयोग ने इस फॉर्म के जरिए बड़ी संख्या में आवेदन दाखिल करने पर सीमा तय की है।

रिपोर्टों के अनुसार, दावों और आपत्तियों की विशेष अवधि में एक व्यक्ति अधिकतम 10 आवेदन और सामान्य अवधि में एक महीने में अधिकतम 5 आवेदन दाखिल कर सकेगा। यह व्यवस्था ऑनलाइन और ऑफलाइन, दोनों माध्यमों पर लागू की गई है। आयोग का उद्देश्य थोक में आपत्तियां दाखिल करने से पैदा होने वाली परेशानियों और संभावित दुरुपयोग को नियंत्रित करना है।

दस्तावेज जुटाने में मतदाताओं की मदद करेंगे BLO

पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान नोटिस पाने वाले मतदाताओं को जरूरी दस्तावेज जुटाने में सहायता देने पर भी जोर दिया जा रहा है। बूथ लेवल ऑफिसर जरूरत के अनुसार मतदाताओं को प्रक्रिया समझाने और उनके रिकॉर्ड से जुड़ी समस्याओं के समाधान में मदद करेंगे।

मतदाता सूची में किसी नाम को हटाने से पहले निर्धारित प्रक्रिया का पालन और आपत्तियों का सत्यापन भी महत्वपूर्ण है। इससे गलत या अपूर्ण जानकारी के आधार पर पात्र मतदाता का नाम हटाए जाने की आशंका को कम करने में मदद मिल सकती है।

SIR पर विवाद की मुख्य वजह क्या है ?

विशेष गहन पुनरीक्षण का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाना है, लेकिन इस प्रक्रिया में पात्र नागरिकों के नाम छूटने, दस्तावेजों की उपलब्धता और आपत्तियों के निपटारे को लेकर सवाल उठ रहे हैं। विपक्षी दलों ने प्रक्रिया की पारदर्शिता पर चिंता जताई है, जबकि निर्वाचन अधिकारियों की ओर से पात्र मतदाताओं को सूची में शामिल रखने और लंबित मामलों के समाधान के लिए कदम उठाए जा रहे हैं।

चुनाव आयोग के सामने चुनौती मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने के साथ-साथ प्रत्येक पात्र नागरिक के मतदान अधिकार की रक्षा करना भी है। हाल में किए गए बदलावों का वास्तविक प्रभाव इस बात से स्पष्ट होगा कि लंबित मामलों का निपटारा कितनी पारदर्शिता से होता है और पात्र मतदाताओं को सूची में शामिल करने की प्रक्रिया कितनी सुगम बनती है।

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