राष्ट्रीय

सरकारी कर्मचारियों के लिए बड़ा फैसला: पेरेंट केयर लीव बिल से 45 दिन सवैतनिक अवकाश का रास्ता साफ

राज्यसभा में पेश हुआ विधेयक, माता-पिता की देखभाल को मिला कानूनी अधिकार

नई दिल्ली ( शिखर दर्शन ) // सरकारी और संगठित क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए एक महत्वपूर्ण कल्याणकारी प्रस्ताव सामने आया है, जिसके तहत ‘पवित्र बंधन (माता-पिता देखभाल अवकाश) विधेयक, 2026’ के माध्यम से 45 दिनों तक सवैतनिक अवकाश देने का प्रावधान किया गया है। इस प्रस्ताव को राज्यसभा में पेश किए जाने के बाद कर्मचारियों के हित में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

45 दिन का सवैतनिक अवकाश, सेवा काल में एक बार मिलेगा लाभ

प्रस्तावित विधेयक के अनुसार कर्मचारियों को पूरे सेवाकाल में अधिकतम 45 दिनों का ‘पेरेंट केयर लीव’ मिलेगा। यह अवकाश पूरी तरह सवैतनिक होगा और इसे अन्य किसी भी छुट्टी से समायोजित नहीं किया जाएगा। इसका उद्देश्य कर्मचारियों को अपने वृद्ध माता-पिता की देखभाल के लिए समय और आर्थिक सुरक्षा दोनों प्रदान करना है।

माता-पिता की परिभाषा में सास-ससुर भी शामिल

विधेयक में माता-पिता की व्यापक परिभाषा दी गई है, जिसमें जैविक, दत्तक, सौतेले माता-पिता के साथ-साथ सास-ससुर को भी शामिल किया गया है, बशर्ते उनकी आयु 60 वर्ष या उससे अधिक हो। यह प्रावधान पारिवारिक जिम्मेदारियों को कानूनी रूप से मान्यता देने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

सरकारी और निजी क्षेत्र पर भी लागू होगा नियम

प्रस्ताव के अनुसार यह नियम केंद्र और राज्य सरकार के विभागों के साथ-साथ सार्वजनिक उपक्रमों और उन निजी संस्थानों पर भी लागू होगा, जहां 10 या उससे अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं। इससे व्यापक स्तर पर कर्मचारियों को लाभ मिलने की संभावना है।

कर्मचारी सुरक्षा और दंडात्मक प्रावधान भी शामिल

विधेयक में यह भी स्पष्ट किया गया है कि इस अवकाश का उपयोग करने वाले कर्मचारियों के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाएगा। वहीं, यदि कोई नियोक्ता अवकाश देने से इनकार करता है तो उस पर ₹50,000 से ₹2,00,000 तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। फर्जी दस्तावेजों के आधार पर छुट्टी लेने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई और वेतन वापसी का भी प्रावधान रखा गया है।

सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण कदम

इस विधेयक को तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी और बदलते सामाजिक ढांचे के अनुरूप एक महत्वपूर्ण सुधार माना जा रहा है। इससे कामकाजी वर्ग पर पड़ने वाले मानसिक और पारिवारिक दबाव को कम करने और भारतीय पारिवारिक मूल्यों को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

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