बिलासपुर संभाग

ध्वनि प्रदूषण पर जनहित याचिका: हाईकोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब

ध्वनि प्रदूषण मामला: हाईकोर्ट ने डीजे और साउंड बॉक्स के शोर पर जताई चिंता, सरकार से मांगा जवाब

बिलासपुर ( शिखर दर्शन ) // डीजे और साउंड बॉक्स के कारण हो रहे ध्वनि प्रदूषण और उससे जनता को हो रही समस्याओं के मुद्दे पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में मंगलवार को सुनवाई हुई। इस जनहित याचिका में ध्वनि प्रदूषण को एक गंभीर स्वास्थ्य संकट बताते हुए इसे “अल्ट्रा वायरस” (कानून से परे) घोषित करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं ने इस पर सख्त कार्रवाई की अपील की है, यह कहते हुए कि वर्तमान नियम और दंड अपर्याप्त हैं।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के प्रतिनिधियों ने कहा कि ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए निरंतर कार्रवाई की जा रही है। परंतु याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि कोलाहल अधिनियम के तहत लागू नियमों में कड़ाई की कमी है और यह अव्यवहारिक साबित हो रहे हैं। याचिकाकर्ता ने कहा कि ध्वनि प्रदूषण के मामलों में, महज 500 से 1000 रुपये का जुर्माना लगाया जाता है और संबंधित साउंड उपकरणों को जब्त भी नहीं किया जाता। नतीजतन, नियमों का उल्लंघन करने वालों में भय का अभाव है, और शिकायतें लगातार बनी हुई हैं।

कोर्ट ने जताई गंभीर चिंता, सरकार को दिए सख्त निर्देश

कोर्ट ने डीजे साउंड के शोर के अलावा लेजर और बीम लाइट से होने वाले संभावित खतरों पर भी गहरी चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि तेज आवाज और तीव्र प्रकाश की वजह से लोगों की स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ रही हैं। खासतौर पर तेज़ बीट्स के शोर से दिल की बीमारियों और लेजर लाइट की वजह से आंखों पर बुरा असर पड़ सकता है। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि ध्वनि प्रदूषण और इससे उत्पन्न खतरों को रोकने के लिए उचित उपाय किए जाएं।

इस परिप्रेक्ष्य में, विशेषज्ञों का मानना है कि ध्वनि प्रदूषण से केवल मानसिक तनाव ही नहीं बढ़ता, बल्कि इसका सीधा असर मानव स्वास्थ्य पर पड़ता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, ध्वनि प्रदूषण के कारण हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, नींद में खलल और मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। भारत जैसे विकासशील देश में इस मुद्दे पर ध्यान न देना एक बड़ी चूक मानी जा रही है।

देश में ध्वनि प्रदूषण के बढ़ते मामले

हाल के वर्षों में शहरीकरण के साथ ही विभिन्न समारोहों, धार्मिक और सामाजिक आयोजनों में तेज़ आवाज वाले उपकरणों के उपयोग ने ध्वनि प्रदूषण को एक गंभीर समस्या बना दिया है। कई राज्यों में नागरिक संगठनों द्वारा समय-समय पर इसके खिलाफ आंदोलन भी किए गए हैं। मुंबई, दिल्ली, कोलकाता और बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में ध्वनि प्रदूषण की अधिकतम सीमा को पार करने की घटनाएं आए दिन सामने आती हैं। हालांकि कुछ राज्यों में नियमों के उल्लंघन पर सख्त कार्रवाई की जा रही है, लेकिन इसे नियंत्रित करने के लिए व्यापक उपायों की आवश्यकता है।

ध्वनि प्रदूषण से निपटने के लिए सख्त कदम उठाने की आवश्यकता

ध्वनि प्रदूषण रोकने के लिए राज्य और केंद्र सरकार को मिलकर सख्त कदम उठाने चाहिए। मौजूदा कानूनों की सख्ती से समीक्षा कर, इसमें नए और सख्त प्रावधान जोड़े जाने चाहिए। इसके अंतर्गत नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ भारी जुर्माना और साउंड उपकरणों की जब्ती की कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही, लेजर और बीम लाइट के मानकों को नियंत्रित करने के लिए दिशानिर्देश जारी करने की आवश्यकता है, ताकि स्वास्थ्य पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को रोका जा सके।

इस प्रकार की समस्याओं का समाधान सुनिश्चित करने के लिए समाज में जागरूकता भी आवश्यक है। सरकार और गैर-सरकारी संगठनों को जनता के बीच ध्वनि प्रदूषण के हानिकारक प्रभावों के प्रति जागरूकता फैलानी चाहिए।

कोर्ट का निर्णय अपेक्षित

इस जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद, कोर्ट ने राज्य सरकार को एक सख्त और प्रभावी जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। अगली सुनवाई में यह देखा जाएगा कि सरकार ने ध्वनि प्रदूषण को रोकने के लिए अब तक क्या ठोस कदम उठाए हैं और आगामी नीति में इसके खिलाफ क्या विशेष कदम उठाए जाएंगे।

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