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RBI ने 4 साल बाद बढ़ाई Repo Rate, Home Loan से Personal Loan तक पड़ेगा असर; EMI को लेकर जानें पूरी बात

महंगाई के बढ़ते जोखिम के बीच RBI का बड़ा फैसला, रेपो रेट 5.25% से बढ़कर 5.50% हुआ

मुंबई ( शिखर दर्शन ) //  भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने करीब चार साल बाद पहली बार रेपो रेट में बढ़ोतरी की है। RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक के बाद रेपो रेट 5.25 प्रतिशत से बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत कर दिया गया है। यानी ब्याज दर में 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। इस फैसले का असर आने वाले दिनों में कर्ज की ब्याज दरों और कुछ ग्राहकों की EMI पर पड़ सकता है।

 महंगाई के जोखिम के चलते लिया गया फैसला

RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने 7 अक्टूबर को MPC की बैठक के बाद नई ब्याज दरों का ऐलान किया। केंद्रीय बैंक ने महंगाई के बढ़ते जोखिम को देखते हुए रेपो रेट बढ़ाने का फैसला किया है।

RBI ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए महंगाई का अनुमान 5.0 प्रतिशत से बढ़ाकर 5.2 प्रतिशत कर दिया है। केंद्रीय बैंक के मुताबिक कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, वैश्विक आर्थिक दबाव और खराब मौसम के कारण खाद्य महंगाई का जोखिम बढ़ा है। ऐसे में महंगाई को नियंत्रित रखने के लिए ब्याज दर बढ़ाने का फैसला किया गया।

आने वाले महीनों में महंगाई का अनुमान

RBI ने अलग-अलग तिमाहियों के लिए भी महंगाई का अनुमान जारी किया है। वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में महंगाई 4.9 प्रतिशत, तीसरी तिमाही में 6.0 प्रतिशत और चौथी तिमाही में 5.7 प्रतिशत रहने का अनुमान है। वित्त वर्ष 2027-28 की पहली तिमाही में यह 5.6 प्रतिशत रह सकती है।

इन अनुमानों से संकेत मिलता है कि RBI आने वाले समय में महंगाई को लेकर सतर्क है।

GDP Growth को लेकर RBI का अनुमान

महंगाई के अनुमान में बढ़ोतरी के साथ RBI ने आर्थिक विकास को लेकर भी अपना अनुमान जारी किया है। वित्त वर्ष 2026-27 में GDP Growth 7.1 प्रतिशत रहने का अनुमान है।

तिमाही आधार पर दूसरी तिमाही में 7.2 प्रतिशत, तीसरी तिमाही में 6.9 प्रतिशत, चौथी तिमाही में 6.8 प्रतिशत और वित्त वर्ष 2027-28 की पहली तिमाही में 7.1 प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि का अनुमान लगाया गया है।

Repo Rate क्या होती है?

Repo Rate वह ब्याज दर है, जिस पर RBI बैंकों को कम अवधि के लिए कर्ज उपलब्ध कराता है। जब RBI रेपो रेट बढ़ाता है तो बैंकों के लिए RBI से पैसा लेना महंगा हो सकता है। इसका असर आगे चलकर बैंकों की कर्ज देने वाली ब्याज दरों पर पड़ सकता है।

यही वजह है कि रेपो रेट में बदलाव का असर Home Loan, Car Loan और Personal Loan लेने वाले ग्राहकों तक पहुंच सकता है।

Home Loan और EMI पर कितना असर पड़ेगा?

रेपो रेट में 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी का असर हर ग्राहक पर एक जैसा नहीं होगा। जिन लोगों का फ्लोटिंग रेट वाला कर्ज ऐसी बाहरी बेंचमार्क दर से जुड़ा है, जो RBI की रेपो रेट से प्रभावित होती है, उनकी ब्याज दर बढ़ सकती है।

इसके बाद बैंक ग्राहक की EMI बढ़ा सकते हैं या लोन की अवधि बढ़ सकती है। वहीं, जिन ग्राहकों का लोन फिक्स्ड ब्याज दर पर है, उन पर तत्काल असर जरूरी नहीं है।

Car और Personal Loan भी हो सकते हैं महंगे

रेपो रेट बढ़ने का असर सिर्फ Home Loan तक सीमित नहीं रहता। बैंक अपनी lending rates में बदलाव करते हैं तो Car Loan और Personal Loan की ब्याज दरों पर भी असर पड़ सकता है।

हालांकि वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि संबंधित बैंक अपनी ब्याज दरों में कितना बदलाव करता है और ग्राहक का लोन किस तरह की ब्याज दर से जुड़ा हुआ है।

FD और बचत करने वालों को मिल सकता है फायदा

जहां कर्ज लेने वालों के लिए ब्याज दर बढ़ना चिंता का कारण हो सकता है, वहीं बचत करने वालों को इसका फायदा मिल सकता है। बैंक अपनी जमा योजनाओं, जैसे FD और अन्य Deposit Schemes की ब्याज दरों में भी बढ़ोतरी कर सकते हैं।

अगर बैंक जमा पर ब्याज बढ़ाते हैं तो बचत और निवेश करने वाले ग्राहकों को पहले की तुलना में बेहतर रिटर्न मिल सकता है।

क्या भविष्य में Repo Rate फिर घट सकती है?

अगर आने वाले महीनों में महंगाई नियंत्रण में आती है और आर्थिक परिस्थितियां अनुकूल रहती हैं तो RBI भविष्य में रेपो रेट में कटौती पर विचार कर सकता है। हालांकि इसका फैसला किसी एक कारक पर नहीं होता।

RBI हर मौद्रिक नीति बैठक में महंगाई, GDP Growth, कच्चे तेल की कीमतों, वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों और घरेलू अर्थव्यवस्था समेत कई पहलुओं की समीक्षा के बाद ब्याज दरों पर फैसला करता है।

Repo Rate का इस्तेमाल क्यों किया जाता है?

Repo व्यवस्था का इस्तेमाल बैंकिंग प्रणाली में धन के प्रवाह और नकदी की स्थिति को प्रभावित करने के लिए किया जाता है। इसके जरिए केंद्रीय बैंक अर्थव्यवस्था में उपलब्ध धन की लागत और तरलता पर प्रभाव डाल सकता है।

समय के साथ Repo mechanism दुनिया के कई देशों की मौद्रिक नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। केंद्रीय बैंक इसका इस्तेमाल महंगाई, आर्थिक गतिविधियों और वित्तीय प्रणाली में तरलता को प्रभावित करने के लिए करते हैं।

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