पैर दर्द लेकर पहुंचे अस्पताल, 13 दिन बाद आई मौत की खबर; अपोलो अस्पताल पर गंभीर लापरवाही के आरोप

परिजनों ने उठाए इलाज की पारदर्शिता पर सवाल, कहा- मरीज की हालत और उपचार की जानकारी तक नहीं दी गई, स्वास्थ्य विभाग से निष्पक्ष जांच की मांग
बिलासपुर ( शिखर दर्शन ) // शहर के निजी स्वास्थ्य संस्थानों में इलाज की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। कोरबा निवासी एक परिवार ने अपोलो अस्पताल पर इलाज में लापरवाही और मरीज की वास्तविक स्थिति छिपाने का आरोप लगाते हुए स्वास्थ्य विभाग से शिकायत की है। मामला 81 वर्षीय उदय नारायण जायसवाल की मौत से जुड़ा है, जिनके परिजनों का दावा है कि वे केवल पैर दर्द की शिकायत लेकर अस्पताल पहुंचे थे, लेकिन 13 दिन बाद उनकी मौत की सूचना दे दी गई।
पैर दर्द की शिकायत पर कराया गया था भर्ती
परिजनों के अनुसार 14 अप्रैल को उदय नारायण जायसवाल को दाहिने पैर में दर्द की शिकायत के बाद अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया गया था। परिवार का कहना है कि भर्ती के समय वे पूरी तरह होश में थे, सामान्य रूप से बातचीत कर रहे थे और चलने-फिरने की स्थिति में थे। ऐसे में कुछ ही दिनों में उनकी हालत बिगड़ने और मौत होने से परिवार स्तब्ध है।
आईसीयू और वेंटिलेटर तक पहुंचा मामला
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि इलाज के दौरान मरीज को आईसीयू में भर्ती किया गया और बाद में वेंटिलेटर सपोर्ट पर भी रखा गया। परिजनों का कहना है कि अस्पताल प्रबंधन ने कभी स्पष्ट रूप से नहीं बताया कि मरीज की स्थिति अचानक गंभीर क्यों हुई और कौन सी ऐसी चिकित्सीय जटिलताएं सामने आईं, जिनके कारण उन्हें आईसीयू और वेंटिलेटर की जरूरत पड़ी।
‘सिर्फ हस्ताक्षर कराए गए, जानकारी नहीं दी गई’
परिवार का आरोप है कि उपचार के दौरान अस्पताल की ओर से विभिन्न दस्तावेजों पर हस्ताक्षर तो कराए जाते रहे, लेकिन मरीज को दी जा रही दवाओं, इंजेक्शन, उपचार प्रक्रिया और स्वास्थ्य स्थिति की विस्तृत जानकारी साझा नहीं की गई। परिजनों का कहना है कि उन्हें लगातार अंधेरे में रखा गया और उपचार से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णयों की पर्याप्त जानकारी नहीं दी गई।
27 अप्रैल को दी गई मौत की सूचना
परिजनों के मुताबिक 27 अप्रैल की सुबह अस्पताल प्रबंधन ने उदय नारायण जायसवाल के निधन की जानकारी दी। इसके बाद परिवार ने पूरे घटनाक्रम पर सवाल उठाते हुए चिकित्सा रिकॉर्ड की निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि इलाज पूरी तरह नियमानुसार हुआ है तो अस्पताल को उपचार संबंधी सभी तथ्यों को सार्वजनिक करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
स्वास्थ्य विभाग से निष्पक्ष जांच की मांग
शिकायतकर्ता राजेश कुमार जायसवाल ने स्वास्थ्य विभाग से स्वतंत्र मेडिकल विशेषज्ञों की समिति गठित कर पूरे मामले की जांच कराने की मांग की है। उन्होंने अस्पताल के उपचार रिकॉर्ड, चिकित्सकीय प्रक्रियाओं और निर्णयों की समीक्षा कर दोष तय करने तथा लापरवाही पाए जाने पर संबंधित जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।
अस्पताल प्रबंधन की चुप्पी से बढ़े सवाल
मामले को लेकर अस्पताल प्रबंधन का पक्ष जानने का प्रयास किया गया, लेकिन आरोपों पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। परिजनों का कहना है कि अस्पताल की ओर से आरोपों का सीधा जवाब नहीं दिया जा रहा है, जिससे संदेह और गहरा हो रहा है। हालांकि अस्पताल की ओर से अब तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है।
जांच के बाद ही सामने आएगी सच्चाई
फिलहाल यह मामला शिकायत और आरोपों के स्तर पर है। उपचार में किसी प्रकार की लापरवाही हुई या नहीं, इसका अंतिम निष्कर्ष जांच रिपोर्ट आने के बाद ही सामने आएगा। लेकिन इस घटना ने एक बार फिर निजी अस्पतालों में मरीजों और उनके परिजनों को उपचार संबंधी जानकारी उपलब्ध कराने तथा चिकित्सा प्रक्रियाओं में पारदर्शिता बनाए रखने की आवश्यकता पर गंभीर बहस छेड़ दी है।



