नीतीश कुमार का ‘रिटर्न गिफ्ट’ : बिहार की सत्ता राजनीति में बदले समीकरण और सियासी व्यंग्य की बयार

संपादकीय :
नीतीश बाबू जाते-जाते भाजपा और संघ को ऐसा ‘रिटर्न गिफ्ट’ दे गए हैं, जिसकी टीस नागपुर तक महसूस की जा रही है। अगर इस राजनीतिक दर्द की गहराई समझनी हो, तो जरा विजय सिन्हा के चेहरे की लकीरें पढ़िए और तेजस्वी यादव की मुस्कुराहट देखिए। विजय सिन्हा ने अनजाने में वही सच उगल दिया, जो संघ के स्वयंसेवक और भाजपा के निष्ठावान कार्यकर्ता पिछले कई दिनों से बंद कमरों में एक-दूसरे से इशारों-इशारों में कह रहे थे।
विडंबना देखिए, संघ अपनी स्थापना का 101वां वर्ष मना रहा है और बिहार में पहली बार भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार का सपना भी साकार हुआ है, लेकिन नियति का क्रूर मजाक यह है कि जो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा है, वह न कभी शाखा गया, न उसने कभी ‘नमस्ते सदा वत्सले’ का पाठ किया और न ही वह कभी भाजपा का प्राथमिक सदस्य रहा।
नीतीश कुमार जाते-जाते ऐसा ‘दूल्हा’ थमा गए हैं, जो बारात की विचारधारा से ही मेल नहीं खाता। यही कारण है कि तेजस्वी यादव बगल में बैठकर मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं। उनका तंज भी सटीक बैठता है, क्योंकि मुख्यमंत्री भी उसी ‘समाजवादी पाठशाला’ के ग्रेजुएट हैं, जिसके हेडमास्टर लालू प्रसाद यादव माने जाते हैं। संघ और भाजपा के ‘चाणक्य’ देखते रह गए और बाजी वह मार ले गया, जिसने कभी भगवा झंडा उठाने की औपचारिक ट्रेनिंग ही नहीं ली।
हैरानी की बात यह भी है कि यह पूरा ‘खेला’ बी.एल. संतोष जैसे कड़े संगठन मंत्री और शिवराज सिंह चौहान जैसे दिग्गज नेताओं की मौजूदगी में हुआ। अनुशासन और संगठन की बात करने वाली पार्टी आज एक ऐसे नेतृत्व ढांचे को संभालने पर मजबूर दिख रही है, जिसकी जड़ें विचारधारा के बजाय परिस्थितियों में अधिक गहरी नजर आती हैं।
नीतीश कुमार ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वह राजनीति के ऐसे ‘इंजीनियर’ हैं, जो पुल भले ही कच्चा छोड़ दें, लेकिन विरोधियों की रणनीति पर पानी फेरने वाला बांध बिल्कुल मजबूत बना देते हैं। आज स्थिति कुछ ऐसी है कि राजनीतिक गलियारों में वही पुराना अंदाज लौट आया है—दिल के अरमान आंसुओं में बह गए, हम गली में थे और वो मुख्यमंत्री बन गए।



