माँ : सृष्टि का प्रथम स्पंदन और जीवन की सबसे अनमोल व्याख्या !

विशेष संपादकीय — मदर्स डे पर….
” माँ “
यह केवल एक शब्द नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि की सबसे पवित्र अनुभूति है। संसार में यदि ईश्वर को किसी रूप में देखा जा सकता है, तो वह माँ है। क्योंकि सृजन का जो भाव ब्रह्मांड को जन्म देता है, वही भाव एक माँ के हृदय में “ममता” बनकर धड़कता है।
जब मनुष्य इस दुनिया में पहली बार आँखें खोलता है, तब वह किसी धर्म, जाति, भाषा या पहचान को नहीं जानता — वह केवल माँ को पहचानता है। उसकी धड़कनों की पहली लय माँ होती है, उसकी पहली सुरक्षा माँ होती है और उसकी पहली दुनिया भी माँ ही होती है।

माँ केवल जन्म नहीं देती, वह जीवन गढ़ती है।
वह शरीर को नहीं, व्यक्तित्व को जन्म देती है। वह अपनी कोख में सिर्फ एक शिशु नहीं पालती, बल्कि आने वाले समाज, संस्कार और सभ्यता की नींव तैयार करती है। एक माँ की गोद वह पहली पाठशाला है, जहां से मनुष्य प्रेम, संवेदना, त्याग, अनुशासन और करुणा का पहला पाठ सीखता है।
त्याग की वह प्रतिमा, जो कभी अपने लिए नहीं जीती
दुनिया का हर रिश्ता कहीं न कहीं अपेक्षाओं से जुड़ा होता है, लेकिन माँ का प्रेम एकमात्र ऐसा प्रेम है, जो पूर्णतः निस्वार्थ होता है।
वह अपने हिस्से का निवाला बच्चों की थाली में रख देती है। वह अपने अधूरे सपनों की राख पर संतान के भविष्य का महल खड़ा करती है। वह दर्द में भी मुस्कुराती है, टूटकर भी संभालती है और थककर भी चलती रहती है।

एक माँ का जीवन तपस्या का वह अखंड दीप है, जो स्वयं जलकर अपने परिवार का भविष्य रोशन करता है।
कुदरत ने माँ को वह शक्ति दी है, जो किसी योद्धा में नहीं, किसी राजा में नहीं और शायद देवताओं में भी नहीं।
वह आँसू पीकर मुस्कुराना जानती है।
वह भूखी रहकर बच्चों का पेट भरना जानती है।
वह अपने दर्द छिपाकर घर में खुशियाँ बचाए रखना जानती है।
आधुनिक दौर में सबसे ज्यादा अकेली होती जा रही है माँ
विडंबना यह है कि जिस माँ ने उंगली पकड़कर चलना सिखाया, आज वही माँ जीवन के अंतिम पड़ाव में अकेली छोड़ दी जा रही है।
भौतिक सुखों की अंधी दौड़, टूटते संयुक्त परिवार, रिश्तों में बढ़ती संवेदनहीनता और स्वार्थ से भरे आधुनिक जीवन ने माँ को सबसे ज्यादा आहत किया है।
आज बच्चे बड़े घर बना रहे हैं, लेकिन उन घरों में माँ के लिए समय नहीं बच रहा।
मोबाइल की स्क्रीन चमक रही है, लेकिन माँ की आँखों की चमक फीकी पड़ती जा रही है।
यह केवल पारिवारिक संकट नहीं, यह समाज के नैतिक पतन का संकेत है।
क्योंकि जिस समाज में माँ उपेक्षित हो जाती है, वहाँ संस्कार धीरे-धीरे मरने लगते हैं।
माँ केवल सम्मान नहीं, सहभागिता भी चाहती है
समाज ने सदियों तक माँ को त्याग और सहनशीलता की प्रतिमा बनाकर पूजने की कोशिश की, लेकिन अब समय केवल “पूजा” का नहीं, “सम्मान” का है।
माँ को निर्णयों में भागीदारी चाहिए।
उसे अपने अस्तित्व की पहचान चाहिए।
उसे यह एहसास चाहिए कि वह केवल जिम्मेदारियों का बोझ उठाने वाली स्त्री नहीं, बल्कि परिवार और समाज की सबसे महत्वपूर्ण धुरी है।
माँ को फूलों और संदेशों से ज्यादा जरूरत अपने बच्चों के समय, संवेदना और साथ की है।
माँ का ऋण कभी चुकाया नहीं जा सकता
मनुष्य जीवन में चाहे कितनी भी ऊँचाइयाँ हासिल कर ले, लेकिन वह माँ के ऋण से कभी मुक्त नहीं हो सकता।
क्योंकि माँ वह शक्ति है, जो अपने बच्चों के लिए हर दर्द सह लेती है, लेकिन बदले में केवल एक अपनापन चाहती है।
जब जीवन की हर राह कठिन लगती है, तब इंसान अनजाने में “माँ” ही पुकारता है।
यही इस रिश्ते की सबसे बड़ी सच्चाई है।
इस मदर्स डे पर केवल उत्सव नहीं, संकल्प भी जरूरी
मदर्स डे केवल सोशल मीडिया पोस्ट या एक दिन के उत्सव का अवसर नहीं होना चाहिए।
यह आत्ममंथन का दिन होना चाहिए।
यह वह दिन होना चाहिए, जब हम स्वयं से पूछें —
क्या हमने सच में अपनी माँ को वह सम्मान दिया, जिसकी वह अधिकारिणी है ?
क्या हमने कभी उसकी खामोश पीड़ा को समझने की कोशिश की ?
क्या हमने उसके त्याग को केवल “कर्तव्य” मान लिया ?

जरूरत इस बात की है कि माँ को जीवन के हर दिन वह आदर मिले, जिसकी वह हकदार है।
उसकी झुर्रियों में फिर से आत्मगौरव लौटे, उसकी आँखों में फिर से वही चमक दिखे और उसके चेहरे पर यह विश्वास बना रहे कि उसका त्याग व्यर्थ नहीं गया।
क्योंकि सच यही है —
जिस दिन माँ मुस्कुराती है, उसी दिन संसार सचमुच सुंदर लगता है।
✍️ लेखक: [ राजेश निर्मलकर , B.J.M.C. (Bachelor of Journalism & Mass Communication), M.M.C.J. (Masters of Mass Communication & Journalism), L.L.B. (Bachelor of Laws) , डायरेक्टर, शिखर दर्शन न्यूज ]




