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राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने फहराया सिंहस्थ कुंभ का धर्मध्वज, नासिक-त्र्यंबकेश्वर में गूंजा शंखनाद; जुलाई 2028 तक चलेगा भव्य आयोजन

गोदावरी के तट पर वैदिक मंत्रोच्चार के बीच हुआ धर्मध्वज पूजन, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने त्र्यंबकेश्वर में फहराई ध्वजा; 21 महीने तक चलेगा सिंहस्थ कुंभ का धार्मिक उत्सव

नासिक ( शिखर दर्शन ) // महाराष्ट्र के नासिक में गोदावरी नदी के पवित्र तट पर शनिवार को वैदिक मंत्रोच्चार और शंखनाद के बीच नासिक-त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ कुंभ मेले के शुभारंभ का धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुआ। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने रामतीर्थ में संतों, जनप्रतिनिधियों और हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में धर्मध्वज फहराया। इस ऐतिहासिक अवसर पर पूरा परिसर वैदिक मंत्रों और शंखध्वनि से गुंजायमान हो उठा। वहीं, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने त्र्यंबकेश्वर स्थित कुशावर्त तीर्थ में सिंहस्थ कुंभ के लिए धर्मध्वज फहराया। इस आयोजन के साथ ही वर्ष 2028 में होने वाले भव्य सिंहस्थ कुंभ की धार्मिक तैयारियों का औपचारिक आगाज हो गया है।

राष्ट्रपति ने गोदावरी पूजन के बाद फहराया धर्मध्वज

धर्मध्वज फहराने से पहले राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने यज्ञकुंड में विधि-विधान से आहुतियां अर्पित कीं। इसके बाद उन्होंने जीवनदायिनी गोदावरी नदी का पूजन किया और धर्मध्वज के समक्ष नमन किया। पुरोहितों के वैदिक मंत्रोच्चार के बीच जैसे ही राष्ट्रपति ने धर्मध्वज फहराया, शंखनाद से रामतीर्थ का पूरा परिसर गूंज उठा। धार्मिक अनुष्ठान पुरोहित संघ के अध्यक्ष चंद्रशेखर पंचक्षरी और पुरोहित सतीश शुक्ला के नेतृत्व में संपन्न हुए।

समारोह के बाद पुरोहित सतीश शुक्ला ने कहा कि धर्मध्वज केवल धार्मिक पहचान का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह हजारों वर्षों की सांस्कृतिक स्मृतियों और परंपराओं को वर्तमान से जोड़ने वाला पवित्र प्रतीक है।

त्र्यंबकेश्वर में मुख्यमंत्री फडणवीस ने फहराई ध्वजा

नासिक से लगभग 30 किलोमीटर दूर त्र्यंबकेश्वर के कुशावर्त तीर्थ और गोदावरी नदी के तट पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी सिंहस्थ कुंभ के लिए धर्मध्वज फहराया। इस अवसर पर श्रृंगेरी पीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य विधुशेखर भारती सहित अनेक संत और धार्मिक हस्तियां उपस्थित रहीं। पुरोहितों ने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ गोदावरी नदी की स्तुति की। इसके बाद संकल्प अनुष्ठान संपन्न हुआ, जिसमें सभी प्राणियों के सुख, शांति, समृद्धि और कल्याण की कामना की गई।

सिंहस्थ कुंभ में धर्मध्वज का विशेष महत्व

हिंदू धार्मिक और ज्योतिषीय परंपरा में सिंहस्थ कुंभ का संबंध बृहस्पति ग्रह के सिंह राशि में प्रवेश से माना जाता है। इसी मान्यता के आधार पर इस आयोजन का विशेष धार्मिक महत्व है। धर्मध्वज फहराने की परंपरा कुंभ के धार्मिक अनुष्ठानों और सांस्कृतिक आयोजन की शुरुआत का महत्वपूर्ण प्रतीक मानी जाती है।

धर्मध्वज पर अंकित हैं कई पवित्र प्रतीक

श्री गंगा-गोदावरी धर्मध्वज पर अंकित प्रत्येक प्रतीक का अपना धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। ध्वज पर बना अमृत कुंभ अमरता, मोक्ष और दिव्य शक्ति का प्रतीक है। वहीं ओंकार चिह्न संपूर्ण ब्रह्मांड और सर्वव्यापकता का संदेश देता है। ‘श्री’ अक्षर को विजय और शुभता का प्रतीक माना गया है।

ध्वज पर रेशम के 12 गुच्छे सामाजिक एकता और सामूहिक शक्ति को दर्शाते हैं। इसके साथ एक बड़ी और तीन छोटी घंटियां ब्रह्मांडनाद अर्थात मूल ध्वनि का प्रतीक हैं। ध्वज के दूसरी ओर देवी गोदावरी के वाहन मगरमच्छ के साथ सूर्य और चंद्रमा के शुभ प्रतीक भी अंकित किए गए हैं।

श्रद्धालुओं के स्वागत के लिए तैयार हो रहे नासिक और त्र्यंबकेश्वर

सिंहस्थ कुंभ को लेकर महाराष्ट्र सरकार और स्थानीय प्रशासन ने तैयारियां तेज कर दी हैं। देश-विदेश से लाखों श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना को देखते हुए बुनियादी सुविधाओं, स्वच्छता, यातायात प्रबंधन, सुरक्षा और आवागमन की व्यवस्थाओं पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

नासिक के संरक्षक मंत्री गिरीश महाजन ने कहा कि इस भव्य धार्मिक आयोजन में प्राचीन परंपराओं की पवित्रता बनाए रखते हुए आधुनिक प्रबंधन व्यवस्था विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है। प्रशासन यह सुनिश्चित करने के लिए काम कर रहा है कि गोदावरी के दर्शन, पवित्र स्नान और संतों का सानिध्य प्राप्त करने आने वाले श्रद्धालुओं की यात्रा सुरक्षित, सुगम और यादगार हो।

जुलाई 2028 तक चलेगा सिंहस्थ कुंभ का आयोजन

निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, नासिक-त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ कुंभ से जुड़े धार्मिक आयोजन जुलाई 2028 तक चलेंगे। त्र्यंबकेश्वर में समापन समारोह 24 जुलाई 2028 को और नासिक में 29 जुलाई 2028 को निर्धारित किया गया है। इस प्रकार सिंहस्थ कुंभ की कुल अवधि लगभग 21 महीने रहेगी।

गोदावरी के पवित्र तट पर लहराता धर्मध्वज अब देश-दुनिया के श्रद्धालुओं को इस भव्य धार्मिक आयोजन से जुड़ने का निमंत्रण दे रहा है। संतों, अखाड़ों, आध्यात्मिक गुरुओं और श्रद्धालुओं की सहभागिता से नासिक और त्र्यंबकेश्वर एक बार फिर देश के प्रमुख धार्मिक केंद्रों के रूप में विशेष पहचान बनाने की तैयारी में हैं।

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