दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट में महंगे ‘सुपरस्टार’ वकीलों की कार्यशैली पर उठे सवाल, लंबी बहस से नाराज अदालत; जानिए देश के 10 महंगे वकीलों की फीस

एनसीएलएटी की चेन्नई पीठ ने जताई थी नाराजगी, सुप्रीम कोर्ट में भी उठा मामला; मुकुल रोहतगी और सॉलिसिटर जनरल की टिप्पणी के बाद चर्चा में आई वरिष्ठ वकीलों की फीस

नई दिल्ली ( शिखर दर्शन ) // देश की न्यायिक व्यवस्था में वरिष्ठ और महंगे वकीलों की कार्यशैली को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। अदालतों में लंबी दलीलें पेश करने और सुनवाई के लिए निर्धारित समय से अधिक वक्त लेने को लेकर कुछ वरिष्ठ वकीलों पर सवाल उठे हैं। आरोप है कि नामचीन वकीलों की लंबी बहस के कारण दूसरे मामलों की सुनवाई प्रभावित होती है और न्यायाधीशों को अतिरिक्त समय तक काम करना पड़ता है। यह मामला पहले राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) की चेन्नई पीठ में उठा और शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में भी चर्चा का विषय बन गया।

इस दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट की पीठ के सामने चेन्नई पीठ की नाराजगी का उल्लेख किया। इस पर न्यायाधीशों और सॉलिसिटर जनरल की टिप्पणियों ने मामले को और चर्चा में ला दिया। खास बात यह है कि इस विवाद के बीच देश के सबसे महंगे माने जाने वाले वरिष्ठ वकीलों की प्रति पेशी फीस को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है।

लंबी बहस और महंगी फीस पर एनसीएलएटी ने जताई नाराजगी

गुरुवार को एनसीएलएटी की चेन्नई पीठ ने दिल्ली से आने वाले कुछ वरिष्ठ वकीलों की लंबी दलीलों पर असंतोष जताया था। पीठ का कहना था कि किसी अधिवक्ता की वरिष्ठता अथवा उसकी भारी-भरकम फीस के आधार पर उसे अदालत में अतिरिक्त समय लेने का विशेष अधिकार नहीं मिल जाता। सुनवाई में सभी पक्षों को समान अवसर मिलना चाहिए और न्यायालय के समय का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।

पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि लंबी बहसों के कारण न्यायाधीशों को शनिवार को भी काम करना पड़ रहा है। साथ ही संकेत दिया कि आवश्यकता पड़ने पर वकीलों की दलीलों के लिए समय-सीमा निर्धारित की जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट में मुकुल रोहतगी ने उठाया मुद्दा

शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला की अध्यक्षता वाली पीठ को बताया कि एनसीएलएटी की चेन्नई पीठ दिल्ली के कुछ वकीलों से काफी नाराज है। इस पर न्यायमूर्ति पारदीवाला ने सहमति जताते हुए कहा कि यह बात सही है।

रोहतगी ने बताया कि चेन्नई पीठ की शिकायत है कि अधिक फीस लेने वाले कुछ नामचीन वकील अदालत के समय का पर्याप्त ध्यान नहीं रखते और अपनी दलीलें लंबी खींचते हैं। उन्होंने उस टिप्पणी का भी उल्लेख किया, जिसमें पीठ ने सवाल उठाया था कि लंबी सुनवाई के कारण न्यायाधीशों को शनिवार को भी क्यों काम करना पड़े।

सॉलिसिटर जनरल ने भी टिप्पणी को बताया तथ्यात्मक

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति पारदीवाला ने पूछा कि यह टिप्पणी किसने की थी और क्या किसी न्यायिक सदस्य ने ऐसा कहा था। मुकुल रोहतगी ने इसकी पुष्टि की। इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि ऐसी बात कहना उचित है या नहीं, यह अलग विषय है, लेकिन तथ्यात्मक रूप से लगाए गए आरोप गलत नहीं हैं।

इसके बाद न्यायमूर्ति विनोद चंद्रन ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के कहने पर उन्होंने भी इस मामले में एक आदेश जारी किया था। अंत में न्यायमूर्ति पारदीवाला ने टिप्पणी करते हुए कहा, ‘चलो, इसको जाने दो।’

भारत के 10 महंगे वकील, लाखों रुपये तक है अनुमानित फी

इस पूरे विवाद के बीच देश के नामचीन वरिष्ठ अधिवक्ताओं की फीस भी चर्चा में है। मीडिया रिपोर्टों और कानूनी क्षेत्र से जुड़ी वेबसाइटों पर प्रकाशित अनुमानों के मुताबिक, कुछ चर्चित वकील एक पेशी के लिए लाखों रुपये तक फीस लेते हैं। द लॉ एकेडमी की अगस्त में प्रकाशित अनुमानित सूची में इन वरिष्ठ अधिवक्ताओं की फीस का उल्लेख किया गया है।

देश के चर्चित 10 महंगे वकीलों की अनुमानित प्रति पेशी फीस

क्र.वकील का नामअनुमानित फीस प्रति पेशी
1.हरीश साल्वे12 से 15 लाख रुपये, कुछ मामलों में 25 लाख रुपये तक
2.अभिषेक मनु सिंघवी6 से 12 लाख रुपये, कुछ मामलों में 15 लाख रुपये तक
3.कपिल सिब्बल6 से 15 लाख रुपये
4.पी. चिदंबरम5 से 15 लाख रुपये
5.सीए सुंदरम4.5 से 16.5 लाख रुपये
6.के. पारासरन10 से 12 लाख रुपये
7.मुकुल रोहतगी6 से 12 लाख रुपये, कुछ मामलों में 20 लाख रुपये तक
8.केके वेणुगोपाल7 से 15 लाख रुपये
9.मेनका गुरुस्वामी5 से 10 लाख रुपये
10.गोपाल सुब्रमण्यम5.5 से 15 लाख रुपये

नोट: ये मीडिया एवं कानूनी वेबसाइटों पर प्रकाशित अनुमानित फीस हैं। वास्तविक फीस मामले और अधिवक्ता के साथ हुए समझौते के अनुसार अलग हो सकती है।

उल्लेखनीय है कि ये फीस मीडिया और कानूनी वेबसाइटों पर प्रकाशित अनुमान हैं, कोई आधिकारिक निर्धारित दर नहीं। वास्तविक फीस मामले की प्रकृति, जटिलता, अदालत और अधिवक्ता के साथ हुए समझौते के आधार पर अलग-अलग हो सकती है।

अदालत के समय और सभी पक्षों के सुनवाई अधिकार पर बहस

इस घटनाक्रम ने न्यायिक व्यवस्था में समय प्रबंधन और वरिष्ठ अधिवक्ताओं की जिम्मेदारी को लेकर एक महत्वपूर्ण चर्चा को जन्म दिया है। अदालतों में प्रत्येक पक्ष को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर मिलना जरूरी है। ऐसे में लंबी दलीलों और सुनवाई के समय के बीच संतुलन बनाए रखना न्यायिक प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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