केजरीवाल का प्रचार पड़ा भारी! ममता और स्टालिन दोनों को सत्ता से धोना पड़ा हाथ

बंगाल और तमिलनाडु चुनाव परिणामों ने विपक्षी रणनीति पर उठाए सवाल
नई दिल्ली ( शिखर दर्शन ) // पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम सामने आने के बाद पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के नतीजों ने राजनीतिक समीकरणों को नया मोड़ दे दिया है। इन दोनों राज्यों में क्षेत्रीय दलों के प्रदर्शन ने जहां कई दावों को झटका दिया है, वहीं विपक्षी एकता के प्रमुख चेहरों की साख पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। खासतौर पर आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल की भूमिका को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई है, क्योंकि उन्होंने दोनों राज्यों में सक्रिय प्रचार किया था, लेकिन इसका अपेक्षित असर नजर नहीं आया।
तमिलनाडु में 20 अप्रैल 2026 को चेन्नई के पुलियानथोपे में केजरीवाल ने एम.के. स्टालिन के समर्थन में रोड शो करते हुए उन्हें अपना ‘भाई’ बताया था और भाजपा के खिलाफ तीखे बयान दिए थे। हालांकि चुनाव परिणामों में डीएमके को उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिल सकी और वह पिछड़ती नजर आई, जबकि अभिनेता विजय की पार्टी ने उल्लेखनीय प्रदर्शन कर सबको चौंका दिया। इससे यह संकेत मिला कि बाहरी नेताओं के प्रचार का प्रभाव सीमित रहा।
वहीं पश्चिम बंगाल में भी 26-27 अप्रैल को केजरीवाल ने ममता बनर्जी के पक्ष में कई रैलियां और रोड शो किए। उन्होंने केंद्र सरकार की नीतियों की आलोचना करते हुए टीएमसी के लिए समर्थन मांगा, लेकिन चुनावी नतीजों में इसका कोई स्पष्ट सकारात्मक असर दिखाई नहीं दिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि स्थानीय मुद्दों और नेतृत्व को ही मतदाताओं ने प्राथमिकता दी।
इन दोनों राज्यों के नतीजों से यह संकेत मिल रहा है कि राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता की रणनीति और बाहरी नेताओं के प्रचार की प्रभावशीलता पर पुनर्विचार की जरूरत है। चुनाव परिणामों ने यह भी स्पष्ट किया है कि क्षेत्रीय राजनीति में स्थानीय कारक और नेतृत्व ही निर्णायक भूमिका निभाते हैं।



