छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक बना कानून, राजपत्र में हुआ प्रकाशित

जबरन धर्मांतरण पर सख्त सजा का प्रावधान, जानिए मुख्य बातें
रायपुर ( शिखर दर्शन ) // छत्तीसगढ़ में जबरन और प्रलोभन से धर्मांतरण पर रोक लगाने के लिए पारित धर्म स्वातंत्र्य विधेयक अब कानून बन गया है। विधानसभा से 19 मार्च को पारित इस विधेयक को राज्यपाल की मंजूरी मिलने के बाद राजपत्र में प्रकाशित कर दिया गया है, जिससे यह अब पूरे प्रदेश में प्रभावी हो गया है।
विधेयक का उद्देश्य धर्मांतरण से जुड़ी गतिविधियों को पारदर्शी बनाना और नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा सुनिश्चित करना है। नए कानून में धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया, निगरानी और दंड से जुड़े कई सख्त प्रावधान किए गए हैं।
मुख्य प्रावधान इस प्रकार हैं :
- धर्म परिवर्तन से पहले संबंधित व्यक्ति को प्राधिकृत अधिकारी के समक्ष आवेदन देना अनिवार्य होगा।
- निर्धारित समय सीमा में सूचना सार्वजनिक की जाएगी और आपत्तियां आमंत्रित की जाएंगी।
- जांच पूरी होने के बाद ही धर्म परिवर्तन का प्रमाणपत्र जारी किया जाएगा।
- किसी भी प्रकार के दबाव, भय या प्रलोभन से किया गया धर्मांतरण अवैध माना जाएगा।
- धर्मांतरण कराने वाले व्यक्तियों और संस्थाओं के लिए पंजीयन अनिवार्य किया गया है।
- ग्राम सभा को भी प्रक्रिया में शामिल किया गया है, जिससे पारदर्शिता बढ़ेगी।
- विवाह को धर्मांतरण का आधार नहीं माना जाएगा, इसके लिए अलग प्रक्रिया का पालन करना होगा।
सजा का प्रावधान :
- सामान्य अवैध धर्मांतरण पर 7 से 10 वर्ष तक की सजा और न्यूनतम 5 लाख रुपये जुर्माना।
- महिला, अनुसूचित जाति/जनजाति और नाबालिग के मामले में 10 से 20 वर्ष की सजा और न्यूनतम 10 लाख रुपये जुर्माना।
- सामूहिक धर्मांतरण पर 10 वर्ष से आजीवन कारावास और न्यूनतम 25 लाख रुपये जुर्माना।
- लोक सेवक द्वारा अपराध करने पर 10 से 20 वर्ष की सजा और 10 लाख रुपये तक जुर्माना।
- धन के माध्यम से धर्मांतरण कराने पर 10 से 20 वर्ष की सजा और 20 लाख रुपये तक जुर्माना।
- भय या प्रलोभन से धर्मांतरण पर 10 से 20 वर्ष की सजा और न्यूनतम 30 लाख रुपये जुर्माना।
- दोबारा अपराध करने पर आजीवन कारावास का प्रावधान।
इसके अलावा कानून में पीड़ितों के लिए क्षतिपूर्ति का भी प्रावधान किया गया है। यदि किसी व्यक्ति का धर्म परिवर्तन दबाव या धोखे से किया गया है, तो उसे पीड़ित मानते हुए अदालत आरोपी को मुआवजा देने का आदेश दे सकती है।
इस अधिनियम के तहत मामलों की जांच उप निरीक्षक या उससे वरिष्ठ अधिकारी द्वारा की जाएगी, जिससे मामलों की गंभीरता और निष्पक्षता सुनिश्चित की जा सके।



