छत्तीसगढ़

हरेली: हरियाली का उत्सव नहीं, संस्कृति और संकल्प का संदेश

छत्तीसगढ़ की मिट्टी में बसे त्यौहार केवल तिथियों का क्रम नहीं, बल्कि यहां के जनजीवन की आत्मा हैं। इन्हीं पर्वों में एक अद्भुत पर्व है हरेली—जो सिर्फ एक ग्रामीण त्यौहार नहीं, बल्कि कृषि संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। यह त्यौहार न केवल खेत-खलिहानों से जुड़े लोगों के श्रम का उत्सव है, बल्कि प्रकृति के साथ उनके गहरे रिश्ते का उत्सव भी है।

हरेली का शाब्दिक अर्थ है हरियाली—और यह त्यौहार वर्षा ऋतु में, जब खेतों में हरियाली लहराने लगती है, तब मनाया जाता है। यह किसानों की उम्मीद, श्रम और आस्था का पर्व है, जिसमें वे अपने कृषि उपकरणों की पूजा करते हैं, बैलों को स्नान कराकर श्रृंगारित करते हैं और खेतों में जाकर प्रकृति को नमन करते हैं। यह त्योहार किसी धर्म विशेष की सीमा में नहीं बंधता, बल्कि यह धरती से जुड़ी उस सोच का प्रतिनिधित्व करता है जो प्रकृति को पूज्य मानती है।

छत्तीसगढ़ में हरेली का विशेष महत्व इसलिए भी है क्योंकि यह उस राज्य की सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता और परंपराओं की जीवंतता को दर्शाता है। जहाँ एक ओर यह पर्व कृषि से जुड़ा है, वहीं दूसरी ओर यह लोकरंजन, लोकसंस्कृति और सामूहिकता का भी प्रतीक है। हरेली के दिन लोग “गेड़ी चढ़ना”, “नरवा-गरवा-घुरवा-बाड़ी” जैसे पारंपरिक अभियान को सशक्त करते हैं, जो आज के जलवायु संकट और जैव विविधता की चुनौतियों के बीच हमारी चेतना को झकझोरते हैं।

लेकिन सवाल यह है कि क्या हमने इस परंपरा को उसके मूल रूप में संजो कर रखा है? आज के तेज रफ्तार आधुनिक युग में जहां त्यौहार सिर्फ सोशल मीडिया पोस्ट बनकर रह जाते हैं, वहीं हरेली जैसे पर्व हमें याद दिलाते हैं कि विकास का अर्थ केवल तकनीकी उन्नति नहीं, बल्कि सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा रहना भी है।

शहरों में हरेली भले ही औपचारिकता बन गया हो, लेकिन गांवों में आज भी यह पर्व बच्चों की हंसी, बैलों की घंटियों और ढोल-नगाड़ों की थाप से जीवंत होता है। यह हमें बताता है कि खेती केवल जीविका नहीं, एक जीवन दर्शन है।

आज जब किसान आत्महत्या जैसे भयावह संकटों से जूझ रहे हैं, तब ऐसे पर्व हमें उनका मनोबल बढ़ाने और समाज को कृषि के महत्व का पुनः बोध कराने का अवसर देते हैं। हमें चाहिए कि हम हरेली को केवल एक पारंपरिक आयोजन न मानें, बल्कि इसे कृषि जागरूकता और ग्रामीण सशक्तिकरण का माध्यम बनाएं।

हरेली, केवल एक पर्व नहीं—यह हमारी धरती माता, हमारे अन्नदाता और हमारी सांस्कृतिक अस्मिता को नमन करने का दिन है। आइए, इस हरेली पर सिर्फ बैलों को नहीं, अपने विचारों को भी हरियाली की ओर मोड़ें।

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