लाखों भक्तों के बीच निकले बाबा महाकाल, चांदी की पालकी में नगर भ्रमण कर जानी प्रजा की कुशलक्षेम

जयघोष से गूंज उठी अवंतिका नगरी, रामघाट पर हुआ पूजन-अभिषेक; ‘शिखर दर्शन’ के प्रधान संपादक ने की मौके से विशेष कवरेज
उज्जैन ( शिखर दर्शन ) // सावन के पवित्र माह के दूसरे सोमवार पर सोमवार को धर्मनगरी उज्जैन एक बार फिर आस्था, भक्ति और श्रद्धा के महासागर में डूबी नजर आई।
विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर से राजाधिराज भगवान महाकाल चांदी की पालकी में सवार होकर अपनी प्रजा का हाल जानने नगर भ्रमण पर निकले। बाबा महाकाल के दर्शन के लिए नगर के प्रमुख मार्गों पर लाखों श्रद्धालु घंटों पहले से डटे रहे। जैसे ही पालकी के दर्शन हुए, पूरा वातावरण ‘हर-हर महादेव’, ‘जय श्री महाकाल’ के जयघोष से गूंज उठा।
श्रावण-भादौ मास में भगवान महाकाल के नगर भ्रमण की यह प्राचीन धार्मिक परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और भव्यता के साथ निभाई जा रही है। उज्जैन जिला प्रशासन के अनुसार श्रावण-भादौ मास में प्रत्येक निर्धारित सोमवार को बाबा महाकाल की सवारी निकाली जाती है और अंतिम सवारी राजसी अथवा शाही सवारी होती है। वर्ष 2026 में कुल छह सवारियां निर्धारित हैं, जिनमें 3 अगस्त को पहली, 10 अगस्त को दूसरी और 7 सितंबर को अंतिम राजसी शाही सवारी निकलेगी।
चांदी की पालकी में विराजे बाबा महाकाल:
निर्धारित धार्मिक परंपरा के अनुसार श्री महाकालेश्वर मंदिर में विधिवत पूजन-अर्चन के बाद शाम करीब 4 बजे बाबा महाकाल की सवारी नगर भ्रमण के लिए रवाना हुई। चांदी की पालकी में विराजित बाबा महाकाल के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा। सवारी के मार्ग में श्रद्धालु घंटों तक अपने आराध्य की एक झलक पाने के लिए इंतजार करते रहे।
सवारी के आगे और पीछे प्रशासन तथा पुलिस की सुरक्षा व्यवस्था रही। मार्ग पर बैरिकेडिंग कर श्रद्धालुओं के लिए सुरक्षित दर्शन व्यवस्था बनाई गई। पुलिस बल, प्रशासनिक अधिकारी, नगर निगम सहित विभिन्न विभागों के अधिकारी पूरी व्यवस्था की निगरानी में जुटे रहे।
महाकाल की सवारी का पारंपरिक मार्ग:
श्री महाकालेश्वर मंदिर से निकलने के बाद बाबा महाकाल की सवारी निर्धारित पारंपरिक मार्ग से आगे बढ़ी। सवारी महाकाल चौराहा, गुदरी चौराहा, बक्षी बाजार और कहारवाड़ी होते हुए रामघाट पहुंची।
रामघाट पर मोक्षदायिनी मां क्षिप्रा के तट पर भगवान महाकाल का विधिवत पूजन-अभिषेक किया गया। इसके बाद सवारी वापसी के लिए रामानुजकोट, मोढ़ की धर्मशाला, कार्तिक चौक, खाती समाज मंदिर, सत्यनारायण मंदिर, ढाबा रोड, टंकी चौराहा, छत्री चौक, गोपाल मंदिर, पटनी बाजार और गुदरी बाजार होते हुए पुनः श्री महाकालेश्वर मंदिर पहुंचती है। वर्ष 2026 की 7 सितंबर को निकलने वाली राजसी शाही सवारी में टंकी चौराहा से मिर्जा नईमबेग, तेलीवाड़ा, कंठाल, सतीगेट और सराफा मार्ग का अतिरिक्त भ्रमण भी प्रस्तावित है।
रामघाट पर मां क्षिप्रा का पूजन, फिर मंदिर वापसी:
रामघाट बाबा महाकाल की सवारी का प्रमुख धार्मिक पड़ाव माना जाता है। यहां मां क्षिप्रा के तट पर पूजन-अभिषेक के बाद सवारी आगे बढ़ती है। पारंपरिक रूप से इसके बाद बाबा महाकाल का गोपाल मंदिर पहुंचना भी विशेष आकर्षण का केंद्र रहता है, जहां हरि-हर मिलन की धार्मिक परंपरा जुड़ी हुई है।
सुरक्षा के घेरे में रही बाबा महाकाल की सवारी:
सवारी को लेकर उज्जैन जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन द्वारा व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की गई। पूरे सवारी मार्ग पर बैरिकेडिंग, पुलिस बल, सीसीटीवी, सार्वजनिक उद्घोषणा व्यवस्था और प्रशासनिक अधिकारियों की तैनाती रही।
श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा को देखते हुए मार्ग के संवेदनशील स्थानों पर विशेष निगरानी रखी गई।
सवारी के दौरान पुलिस और प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ विभिन्न विभागों के अधिकारी भी व्यवस्थाओं की निगरानी करते नजर आए। नगर निगम द्वारा सफाई एवं मूलभूत व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी संभाली गई, जबकि पुलिस प्रशासन ने भीड़ नियंत्रण और यातायात व्यवस्था को व्यवस्थित बनाए रखने के लिए व्यापक इंतजाम किए। इस वर्ष सवारी मार्ग पर चिकित्सा दल और एंबुलेंस की व्यवस्था भी की गई है।
‘शिखर दर्शन’ ने मौके से की विशेष कवरेज:
बाबा महाकाल की आज की भव्य सवारी की विशेष कवरेज ‘शिखर दर्शन’ के प्रधान संपादक राजेश निर्मलकर ने स्वयं मौके पर मौजूद रहकर की। उन्होंने सवारी मार्ग, श्रद्धालुओं की भीड़, बाबा महाकाल की पालकी, प्रशासनिक एवं पुलिस व्यवस्था सहित पूरे आयोजन की प्रत्यक्ष कवरेज की।
इस दौरान शिखर दर्शन के प्रचार-प्रसार प्रबंधक गुलाब विश्वकर्मा भी उनके साथ मौजूद रहे और सवारी से जुड़े विभिन्न महत्वपूर्ण दृश्यों एवं गतिविधियों को कवरेज में शामिल किया।
आस्था के सागर में डूबी अवंतिका नगरी:
बाबा महाकाल की सवारी के दौरान उज्जैन की गलियां और प्रमुख बाजार शिवमय नजर आए। सड़क के दोनों ओर खड़े श्रद्धालुओं ने हाथ जोड़कर बाबा महाकाल के दर्शन किए। अनेक स्थानों पर भक्तों ने पुष्पवर्षा कर पालकी का स्वागत किया। घंटों इंतजार के बाद जब बाबा महाकाल की सवारी श्रद्धालुओं के सामने से गुजरी तो भक्तों की आंखों में श्रद्धा और चेहरे पर अद्भुत आनंद दिखाई दिया।
उज्जैन की यह परंपरा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि अवंतिका नगरी की जीवंत सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान है। मान्यता है कि सावन के सोमवार को बाबा महाकाल अपनी प्रजा का हाल जानने नगर भ्रमण पर निकलते हैं। यही कारण है कि देशभर से श्रद्धालु इस दिव्य नगर भ्रमण के साक्षी बनने के लिए उज्जैन पहुंचते हैं। मध्य प्रदेश पर्यटन भी महाकाल सवारी को सावन-भादौ की प्रमुख धार्मिक परंपराओं में शामिल करता है।
हर-हर महादेव… जय श्री महाकाल !



