मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना आज लेंगे सेवानिवृत्ति, 6 माह के प्रभावशाली कार्यकाल में लिए कई ऐतिहासिक फैसले
नई दिल्ली (शिखर दर्शन) // भारत के 50वें मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव खन्ना आज सेवानिवृत्त हो गए। महज 6 महीने के कार्यकाल के बावजूद उन्होंने न्यायिक और प्रशासनिक दोनों मोर्चों पर ऐसे ऐतिहासिक और प्रभावशाली निर्णय लिए, जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट की पारदर्शिता, जवाबदेही और सामाजिक संतुलन को नई दिशा दी।
जस्टिस खन्ना ने 11 नवंबर 2024 को देश के मुख्य न्यायाधीश का कार्यभार संभाला था और 13 मई 2025 को उनका कार्यकाल समाप्त हुआ। इस अल्प अवधि में उन्होंने वक्फ अधिनियम विवाद, धार्मिक स्थलों के मुकदमे, संपत्ति पारदर्शिता, कैशकांड, कॉलेजियम प्रणाली जैसे कई गंभीर मामलों में साहसिक निर्णय लेकर न्यायपालिका की गरिमा को ऊंचाई दी।
🔷 वक्फ एक्ट विवाद पर निर्णायक हस्तक्षेप
वक्फ संशोधन अधिनियम को लेकर उठ रही आपत्तियों पर जस्टिस खन्ना ने निर्णायक हस्तक्षेप करते हुए उसकी कुछ धाराओं पर अंतरिम रोक की मंशा जताई। इसके बाद केंद्र सरकार ने वक्फ संपत्तियों को डिनोटिफाई करने और बोर्ड में नई नियुक्तियां रोकने की घोषणा की।
🔷 धार्मिक स्थलों से जुड़े मुकदमों पर रोक
1991 के “प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट” को लेकर जस्टिस खन्ना ने बड़ा आदेश देते हुए साफ कर दिया कि जब तक सुप्रीम कोर्ट इस कानून की वैधता पर अंतिम निर्णय नहीं देता, तब तक देशभर में इससे जुड़े नए मुकदमे दाखिल नहीं हो सकेंगे और पहले से लंबित मामलों में कोई प्रभावी आदेश भी नहीं दिया जाएगा।
🔷 सुप्रीम कोर्ट जजों की संपत्ति सार्वजनिक करने की पहल
1 अप्रैल 2025 को हुई फुल कोर्ट बैठक में जस्टिस खन्ना की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट के सभी न्यायाधीशों की संपत्ति सार्वजनिक करने का प्रस्ताव पारित हुआ। यह ऐतिहासिक कदम न्यायपालिका में पारदर्शिता और जनविश्वास की दिशा में मील का पत्थर माना जा रहा है।
🔷 ‘कैशकांड’ में सख्त कार्रवाई
दिल्ली हाईकोर्ट के जज यशवंत वर्मा के घर पर जलाए गए नकदी के मामले में जस्टिस खन्ना ने सख्ती दिखाई। उन्होंने 3 जजों की कमेटी बनाकर जांच करवाई और रिपोर्ट सार्वजनिक की। आरोप साबित होने पर वर्मा को इस्तीफा देने को कहा गया, और न मानने पर रिपोर्ट राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री को भेज दी गई ताकि संसद में महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हो सके।
🔷 कॉलेजियम प्रणाली में पारदर्शिता
जजों की नियुक्ति में पारदर्शिता के तहत, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा बीते 3 वर्षों में केंद्र को भेजी गई सिफारिशों को सार्वजनिक कर दिया। साथ ही यह भी बताया कि इनमें कितने उम्मीदवार SC/ST, OBC, अल्पसंख्यक, महिला वर्ग से थे और कितने जजों के रिश्तेदार थे। इस कदम से न्यायपालिका में भाई-भतीजावाद की आलोचना को ठोस उत्तर मिला।
मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना का 6 महीनों का कार्यकाल भले ही अल्पकालिक रहा हो, लेकिन उनके फैसले भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में हमेशा स्मरणीय रहेंगे। न्याय, पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही के प्रतीक के रूप में उनका यह कार्यकाल आने वाले समय के लिए मार्गदर्शक साबित होगा।
