25 साल बाद भी नहीं बच सका तलवार से हमला करने वाला आरोपी: हाईकोर्ट बोला— सजा ऐसी हो, जिससे अपराधियों में कानून का डर बना रहे

दो वर्ष की सजा घटाकर चार माह की, 30 सितंबर तक ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण करने के निर्देश
बिलासपुर ( शिखर दर्शन ) // छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 25 वर्ष पुराने जानलेवा हमले के एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि केवल समय बीत जाने से गंभीर अपराध की सजा समाप्त नहीं हो सकती। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दंड का उद्देश्य केवल अपराधी को सजा देना नहीं, बल्कि समाज में कानून का सम्मान और अपराधियों में भय बनाए रखना भी है। हालांकि मामले की परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने आरोपी की दो वर्ष की सजा घटाकर चार माह कर दी है।
ट्रायल कोर्ट के फैसले को दी गई थी चुनौती
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की एकलपीठ में हुई। आरोपी गुरु उर्फ राहुल उर्फ प्रवीण कुमार शिंदे ने ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।
तलवार से किए गए हमले में गंभीर रूप से घायल हुआ था युवक
अभियोजन के अनुसार, 3 दिसंबर 2002 को धमतरी में दीपक कुमार ओझा और आरोपी के बीच विवाद हुआ था। कुछ समय बाद आरोपी अपने दो साथियों के साथ पीड़ित के घर पहुंचा और तलवार से हमला कर दिया। हमले से बचने के प्रयास में पीड़ित ने हाथ आगे किया, जिससे उसकी कोहनी में गंभीर चोट आई और हड्डी टूट गई।
घटना के बाद धमतरी सिटी कोतवाली पुलिस ने मामला दर्ज किया। सुनवाई के उपरांत ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए भारतीय दंड संहिता की धारा 326 के तहत दो वर्ष के कठोर कारावास तथा 500 रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई थी।
अपील में आरोपी ने मांगी थी राहत
हाईकोर्ट में आरोपी की ओर से दलील दी गई कि पिछले 25 वर्षों के दौरान उसने हर सुनवाई में नियमित रूप से उपस्थिति दर्ज कराई, कभी जमानत की शर्तों का उल्लंघन नहीं किया और उसके खिलाफ कोई अन्य आपराधिक मामला भी दर्ज नहीं है। इन आधारों पर पहले से बिताई गई जेल अवधि को ही पर्याप्त सजा मानने का अनुरोध किया गया।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया सजा का उद्देश्य
अदालत ने इस दलील को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया। न्यायालय ने कहा कि किसी भी सजा का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि अपराध की पुनरावृत्ति रोकना और समाज में कानून के प्रति विश्वास बनाए रखना भी होता है। अदालत ने यह भी कहा कि सजा न तो अत्यधिक कठोर होनी चाहिए और न ही इतनी कम कि उसका निवारक प्रभाव समाप्त हो जाए।
चार माह की सजा बरकरार, 30 सितंबर तक सरेंडर के आदेश
मामले में 25 वर्ष से अधिक समय बीत जाने, आरोपी का आपराधिक रिकॉर्ड साफ होने और जमानत की सभी शर्तों का पालन किए जाने को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने सजा घटाकर चार माह कर दी। साथ ही ट्रायल के दौरान जेल में बिताई गई एक माह दस दिन की अवधि का समायोजन (सेट-ऑफ) देने का निर्देश भी दिया।
समय पर आत्मसमर्पण नहीं किया तो होगी गिरफ्तारी
हाईकोर्ट ने आरोपी का जमानत बांड निरस्त करते हुए उसे 30 सितंबर 2026 तक संबंधित ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि निर्धारित तिथि तक आरोपी आत्मसमर्पण नहीं करता है, तो पुलिस उसे गिरफ्तार कर शेष सजा भुगताने की कार्रवाई करेगी तथा इसकी अनुपालन रिपोर्ट हाईकोर्ट में प्रस्तुत करेगी।



