सिम्स में सफेद कोट पहनकर डॉक्टर बनने की पहली सीढ़ी चढ़े MBBS छात्र, सेवा और संवेदना का लिया संकल्प
इंडक्शन डे में नवप्रवेशित विद्यार्थियों को मिली चिकित्सा पेशे की जिम्मेदारियों की सीख, अभिभावकों की मौजूदगी में हुआ भावुक समारोह

बिलासपुर ( शिखर दर्शन ) // छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (सिम्स), बिलासपुर में सोमवार को नवप्रवेशित MBBS बैच-2026 के विद्यार्थियों के लिए व्हाइट कोट सेरेमनी एवं इंडक्शन डे का आयोजन किया गया। मेडिकल शिक्षा के नए सफर की शुरुआत कर रहे विद्यार्थियों को उनके शिक्षकों और विभागाध्यक्षों ने अपने हाथों से सफेद कोट पहनाया। इस दौरान विद्यार्थियों को चिकित्सा पेशे की गरिमा, नैतिक जिम्मेदारियों और मरीजों के प्रति मानवीय संवेदना को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का संकल्प दिलाया गया।
कार्यक्रम में नवप्रवेशित विद्यार्थियों के साथ उनके अभिभावक भी मौजूद रहे। अपने बच्चों को डॉक्टर बनने की दिशा में पहला औपचारिक कदम बढ़ाते देखकर अभिभावकों के चेहरों पर गर्व और भावुकता नजर आई। पूरे सभागार में उत्साह के साथ चिकित्सा सेवा के प्रति जिम्मेदारी का माहौल रहा।
मां सरस्वती के पूजन से हुई शुरुआत
कार्यक्रम की शुरुआत मां सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण और दीप प्रज्वलन के साथ हुई। इसके बाद डॉ. सागरिका प्रधान ने नवप्रवेशित विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों का स्वागत किया तथा समारोह के उद्देश्य और कार्यक्रम की रूपरेखा से अवगत कराया।
उन्होंने कहा कि यह समारोह विद्यार्थियों के मेडिकल शिक्षा के सफर में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।
अधिष्ठाता ने सिम्स की उपलब्धियों और जिम्मेदारियों से कराया परिचित
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं सिम्स के अधिष्ठाता डॉ. रमणेश मूर्ति ने नवप्रवेशित विद्यार्थियों को मेडिकल शिक्षा के नए सफर के लिए शुभकामनाएं दीं। उन्होंने विद्यार्थियों के अभिभावकों को भी बधाई देते हुए कहा कि डॉक्टर बनने की यात्रा में परिवार का सहयोग और विश्वास महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
अपने संबोधन में उन्होंने विद्यार्थियों को सिम्स के गौरवशाली इतिहास, शैक्षणिक उपलब्धियों, आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं और भविष्य की योजनाओं की जानकारी दी। साथ ही चिकित्सा पेशे से जुड़ी जिम्मेदारियों पर जोर देते हुए विद्यार्थियों से ईमानदारी, अनुशासन और सेवा भाव को अपने व्यावसायिक जीवन का आधार बनाने का आह्वान किया।
शिक्षकों ने पहनाया सफेद कोट, शुरू हुआ डॉक्टर बनने का सफर
समारोह का सबसे महत्वपूर्ण क्षण तब आया, जब अधिष्ठाता डॉ. रमणेश मूर्ति ने विभागाध्यक्षों के साथ नवप्रवेशित MBBS विद्यार्थियों को अपने हाथों से व्हाइट कोट पहनाया।
सफेद कोट धारण करने के साथ विद्यार्थियों ने चिकित्सा पेशे की जिम्मेदारियों और गरिमा को स्वीकार किया। उन्हें चिकित्सा सेवा के मूल्यों को आत्मसात करने की शपथ भी दिलाई गई। यह क्षण विद्यार्थियों के मेडिकल करियर की औपचारिक शुरुआत का प्रतीक बना।
‘व्हाइट कोट सिर्फ पोशाक नहीं, जिम्मेदारी का प्रतीक’
चिकित्सा अधीक्षक डॉ. लखन सिंह ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि व्हाइट कोट केवल एक परिधान नहीं, बल्कि त्याग, समर्पण, करुणा और विश्वास का प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि सफेद कोट धारण करने के साथ ही मरीजों के प्रति मानवीय संवेदना और नैतिक जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है। उन्होंने विद्यार्थियों से जीवनभर व्हाइट कोट की गरिमा बनाए रखने और चिकित्सा शिक्षा को केवल डिग्री हासिल करने तक सीमित न रखने का आह्वान किया।
इंडक्शन डे में समझी चिकित्सा सेवा की व्यापक जिम्मेदारी
इंडक्शन डे के माध्यम से विद्यार्थियों को संस्थान की कार्यप्रणाली, चिकित्सा शिक्षा की व्यवस्था और डॉक्टर के रूप में उनकी भविष्य की जिम्मेदारियों से परिचित कराया गया। कार्यक्रम में यह संदेश दिया गया कि मेडिकल कॉलेज में प्रवेश केवल शैक्षणिक उपलब्धि नहीं, बल्कि समाज के स्वास्थ्य और लोगों के जीवन से जुड़ी बड़ी जिम्मेदारी की शुरुआत है।
डॉ. केशव कश्यप ने जताया आभार
कार्यक्रम का समापन मेडिकल एजुकेशन यूनिट के समन्वयक डॉ. केशव कश्यप के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। उन्होंने आयोजन को सफल बनाने में सहयोग देने वाले अधिकारियों, चिकित्सकों, शिक्षकों, कर्मचारियों, विद्यार्थियों और अभिभावकों के प्रति आभार व्यक्त किया।
ये रहे प्रमुख रूप से मौजूद
कार्यक्रम में डॉ. भूपेन्द्र कश्यप, डॉ. मधुमिता मूर्ति, डॉ. हेमलता ठाकुर, डॉ. अर्चना सिंह, डॉ. संगीता रमन जोगी, डॉ. आरती पांडे, डॉ. शिक्षा जांगड़े, डॉ. समीर जैन, डॉ. साधना बागड़े और डॉ. श्रेया तोड़ी सहित सिम्स के विभागाध्यक्ष, वरिष्ठ चिकित्सा शिक्षक, नवप्रवेशित MBBS विद्यार्थी और उनके अभिभावक मौजूद रहे।
एक सफेद कोट के साथ शुरू हुई बड़ी जिम्मेदारी
सिम्स का यह आयोजन केवल नए विद्यार्थियों के स्वागत तक सीमित नहीं रहा। व्हाइट कोट पहनना इन विद्यार्थियों के लिए चिकित्सा सेवा की जिम्मेदारी स्वीकार करने का पहला औपचारिक क्षण बना। समारोह में इस बात पर जोर रहा कि डॉक्टर की पहचान केवल उसकी डिग्री से नहीं, बल्कि मरीज के प्रति संवेदना, सेवा भावना, ईमानदारी और जिम्मेदारी से भी बनती है।



