रायपुर संभाग

शिक्षकों पर डिजिटल पहरा, बाकी महकमों की जवाबदेही कौन तय करेगा ? पढ़ाई छोड़ बाबूगिरी और सरकारी सर्वे में उलझे गुरुजी !

VSK ऐप पर 7 हजार कर्मचारियों की हाजिरी नहीं मिलने पर वेतन रोकने की तैयारी , बड़ा सवाल—क्या सरकारी व्यवस्था में जवाबदेही का पैमाना सिर्फ शिक्षक हैं ?

रायपुर ( शिखर दर्शन ) //

सरकारी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी निभाने वाले शिक्षक आज पढ़ाई के साथ-साथ सरकारी योजनाओं, चुनावी ड्यूटी, जनगणना, विभिन्न सर्वेक्षणों और दूसरे प्रशासनिक कामों का बोझ भी उठा रहे हैं। इसके बावजूद जब सरकारी व्यवस्था में जवाबदेही तय करने की बात आती है, तो सबसे पहले शिक्षकों की उपस्थिति पर निगरानी कड़ी करने की खबरें सामने आती हैं। छत्तीसगढ़ में विद्या समीक्षा केंद्र (VSK) ऐप पर ऑनलाइन हाजिरी दर्ज नहीं होने के करीब 7 हजार मामलों की समीक्षा और वेतन रोकने की तैयारी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सरकारी तंत्र में जवाबदेही का नियम सभी विभागों पर समान रूप से लागू होगा, या निगरानी और सख्ती का सबसे आसान निशाना शिक्षक ही बने रहेंगे?

लोक शिक्षण संचालनालय ने जिला शिक्षा अधिकारियों से संबंधित शिक्षकों और कर्मचारियों की पदस्थापना तथा ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज नहीं होने के कारणों की जानकारी मांगी है। विभागीय स्तर पर कहा गया है कि रिपोर्ट मिलने के बाद नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। लेकिन इस मामले में एक बुनियादी अंतर समझना जरूरी है—ऐप पर हाजिरी दर्ज नहीं होना और कर्मचारी का ड्यूटी से गायब होना, दोनों एक ही बात नहीं हैं। वास्तविक स्थिति की जांच किए बिना किसी शिक्षक को गैरहाजिर मान लेना उचित नहीं होगा।

सिर्फ शिक्षकों की हाजिरी पर सवाल, दूसरे विभागों की जवाबदेही पर चुप्पी क्यों ?

सरकारी कार्यालयों में आम नागरिकों को समय पर काम नहीं मिलने की शिकायतें नई नहीं हैं। राजस्व विभाग में नामांतरण, सीमांकन, बंटवारा और अन्य प्रकरण लंबे समय तक लंबित रहने की शिकायतें सामने आती रहती हैं। पटवारी, तहसीलदार और दूसरे अधिकारियों के स्तर पर काम में देरी होने पर भी नागरिकों को बार-बार कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं।

न्यायालयों में मामलों के वर्षों तक लंबित रहने की समस्या भी आम लोगों के लिए गंभीर चिंता का विषय है। हालांकि, हर देरी के लिए किसी एक कर्मचारी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता; लंबित मामलों के पीछे कार्यभार, संसाधनों की कमी, प्रक्रिया और अन्य कारण भी हो सकते हैं। फिर भी सवाल जायज है कि सरकारी सेवाओं में देरी, फाइलों के निस्तारण और नागरिकों की शिकायतों के समाधान की जवाबदेही तय करने के लिए क्या उतनी ही व्यवस्थित और प्रभावी निगरानी की जा रही है ?

यदि किसी विभाग में कर्मचारी की उपस्थिति और कामकाज की समीक्षा के लिए डिजिटल व्यवस्था बनाई जा सकती है, तो नागरिक सेवाओं से जुड़े दूसरे विभागों में भी समयबद्ध कामकाज, लंबित फाइलों और शिकायतों के निपटारे की पारदर्शी निगरानी क्यों नहीं होनी चाहिए ?

सख्ती हो, लेकिन सभी के लिए समान नियमों के साथ

शिक्षकों की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करना जरूरी है। स्कूलों में शिक्षक समय पर पहुंचें, कक्षाएं नियमित चलें और बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो—इस उद्देश्य पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन निगरानी की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जो वास्तविक अनुपस्थिति और तकनीकी समस्या के बीच अंतर कर सके।

छत्तीसगढ़ के कई दुर्गम इलाकों में मोबाइल नेटवर्क की समस्या रहती है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, सितंबर में नारायणपुर जिले में ऑनलाइन उपस्थिति का औसत करीब 70 प्रतिशत बताया गया और नेटवर्क की कठिनाइयों के कारण कुछ स्कूलों में हाजिरी दर्ज करने में परेशानी सामने आई। ऐसे मामलों में ऑफलाइन उपस्थिति का विकल्प भी महत्वपूर्ण है।

ऐसे में सवाल उठता है कि यदि कोई शिक्षक निर्धारित समय पर स्कूल में मौजूद है, लेकिन नेटवर्क या ऐप की तकनीकी गड़बड़ी के कारण उसकी डिजिटल हाजिरी दर्ज नहीं हो पाती, तो क्या उसका वेतन रोकना न्यायसंगत होगा? पहले वास्तविक उपस्थिति की पुष्टि, तकनीकी समस्या की जांच और संबंधित शिक्षक को अपना पक्ष रखने का अवसर देना जरूरी है।

डिजिटल व्यवस्था का उद्देश्य कामकाज में पारदर्शिता बढ़ाना होना चाहिए, न कि तकनीकी खामी के कारण कर्मचारियों को अनावश्यक मानसिक दबाव में डालना।

शिक्षक पढ़ाएंगे कब, जब उनसे कराए जाएंगे दूसरे विभागों के काम ?

शिक्षा व्यवस्था की एक बड़ी समस्या यह भी है कि शिक्षकों को पढ़ाने के अलावा कई गैर-शैक्षणिक जिम्मेदारियां निभानी पड़ती हैं। चुनावी कार्य, जनगणना, सरकारी सर्वेक्षण और अन्य प्रशासनिक दायित्वों में उनकी सेवाएं ली जाती हैं। इन कार्यों की अपनी सरकारी जरूरतें हो सकती हैं, लेकिन इनका असर स्कूलों में पढ़ाई के लिए उपलब्ध समय पर भी पड़ता है।

जब शिक्षक को कभी सर्वेक्षण, कभी चुनावी जिम्मेदारी और कभी दूसरे प्रशासनिक कामों में लगाया जाता है, तो यह सुनिश्चित करना भी शासन की जिम्मेदारी है कि बच्चों की नियमित पढ़ाई प्रभावित न हो। शिक्षकों से पढ़ाई के साथ लगातार अतिरिक्त काम लेने और फिर शैक्षणिक परिणामों के लिए केवल उन्हीं को जवाबदेह ठहराने से समस्या का पूरा समाधान नहीं निकल सकता।

एक और गंभीर सवाल है—जब शिक्षकों से लिपिकीय और रिकॉर्ड संबंधी काम भी लिए जाते हैं, तो स्कूलों में आवश्यक लिपिकीय व्यवस्था और गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों की जरूरतों का आकलन किस आधार पर किया जा रहा है? शिक्षकों का प्राथमिक दायित्व बच्चों को पढ़ाना है। प्रशासनिक जरूरतों और शिक्षा की गुणवत्ता के बीच संतुलन बनाना शासन की जिम्मेदारी है।

वेतन रोकने से पहले जांच जरूरी, वरना बढ़ेगा अविश्वास :

VSK ऐप पर हाजिरी नहीं दर्ज होने के मामलों में विभाग द्वारा रिपोर्ट मांगा जाना अपने आप में जांच की प्रक्रिया है। लेकिन जांच पूरी होने से पहले सभी संबंधित कर्मचारियों को दोषी मान लेना उचित नहीं होगा। कुछ मामलों में लापरवाही हो सकती है, जबकि अन्य मामलों में नेटवर्क, तकनीकी गड़बड़ी, पदस्थापना संबंधी रिकॉर्ड या दूसरे वैध कारण सामने आ सकते हैं।

इसलिए किसी भी कार्रवाई से पहले प्रत्येक मामले की अलग-अलग जांच होनी चाहिए। वास्तविक अनुपस्थिति प्रमाणित होने पर नियमों के अनुसार कार्रवाई की जाए, लेकिन तकनीकी समस्या या विभागीय रिकॉर्ड की गलती का खामियाजा शिक्षक के वेतन पर नहीं पड़ना चाहिए।

शासन से सीधे सवाल—जवाबदेही का डिजिटल मॉडल सभी विभागों में कब ?

छत्तीसगढ़ सरकार और प्रशासन के सामने कुछ बुनियादी सवाल हैं :

  • क्या सरकारी कर्मचारियों की उपस्थिति और कामकाज की समीक्षा के लिए समान जवाबदेही व्यवस्था सभी विभागों में लागू करने पर विचार होगा ?
  • राजस्व और अन्य नागरिक सेवाओं में लंबित प्रकरणों तथा शिकायतों के निपटारे की समयसीमा और जिम्मेदारी किस तरह तय की जा रही है ?
  • क्या शिक्षकों को चुनाव, जनगणना और गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाने के कारण पढ़ाई पर पड़ने वाले असर का नियमित आकलन किया जाता है ?
  • VSK ऐप पर हाजिरी दर्ज नहीं होने के मामलों में नेटवर्क, तकनीकी खराबी और वास्तविक अनुपस्थिति के बीच अंतर करने की स्पष्ट प्रक्रिया क्या है ?
  • वेतन रोकने जैसी कार्रवाई से पहले संबंधित कर्मचारी को अपना पक्ष रखने और उपस्थिति का प्रमाण देने का पर्याप्त अवसर कैसे मिलेगा ?

सरकारी व्यवस्था में अनुशासन जरूरी है, लेकिन अनुशासन का अर्थ केवल निगरानी बढ़ाना नहीं है। इसका अर्थ है—हर विभाग में समय पर काम, नागरिकों को जवाब, कर्मचारियों की जिम्मेदारी का स्पष्ट निर्धारण और कार्रवाई में निष्पक्षता।

शिक्षकों से जवाबदेही की अपेक्षा है, तो शासन और प्रशासन भी अपनी जवाबदेही से पीछे नहीं हट सकते। बच्चों की पढ़ाई सर्वोपरि है, लेकिन उसके लिए शिक्षकों को पढ़ाने का पर्याप्त समय, जरूरी संसाधन और निष्पक्ष कार्य-व्यवस्था उपलब्ध कराना भी उतना ही जरूरी है।

सरकार यदि डिजिटल निगरानी को पारदर्शिता और अनुशासन का प्रभावी माध्यम मानती है, तो इस व्यवस्था का सिद्धांत केवल एक विभाग तक सीमित नहीं रहना चाहिए। असली सुधार तब दिखाई देगा, जब स्कूल से लेकर तहसील और दूसरे सरकारी कार्यालयों तक कामकाज की समीक्षा समान निष्पक्षता से होगी और आम नागरिक को समय पर सेवा मिलेगी।

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