सर्पदंश मुआवजा घोटाला: अब तहसीलदार-एसडीएम पर भी गिरेगी गाज या बच जाएगी पूरी प्रशासनिक श्रृंखला ?

सिम्स चौकी से शुरू हुई ‘सूचना की चेन’ तहसील तक पहुंची, दो होमगार्ड गिरफ्तार; अब सवाल—करोड़ों के मुआवजे पर अंतिम मुहर लगाने वालों से भी होगी पूछताछ या नहीं?
बिलासपुर ( शिखर दर्शन ) // बिलासपुर के बहुचर्चित सर्पदंश मुआवजा घोटाले की जांच अब उस मोड़ पर पहुंच गई है, जहां कार्रवाई केवल कथित बिचौलियों, कर्मचारियों, डॉक्टरों और पुलिसकर्मियों तक सीमित नहीं रह सकती। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे पूरा प्रशासनिक तंत्र सवालों के घेरे में आता दिखाई दे रहा है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जिन फाइलों पर अंतिम प्रशासनिक स्वीकृति के बाद सरकारी खजाने से लाखों रुपये का मुआवजा जारी हुआ, क्या उन प्रकरणों में जिम्मेदार राजस्व अधिकारियों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच होगी?

प्रदेश की विष्णुदेव साय सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ लगातार “जीरो टॉलरेंस” की नीति का दावा करती रही है। ऐसे में यह मामला अब केवल एक आपराधिक प्रकरण नहीं, बल्कि सरकार की भ्रष्टाचार विरोधी नीति और प्रशासनिक जवाबदेही की भी अग्निपरीक्षा बन गया है।
सिम्स चौकी से शुरू होती थी ‘सेटिंग’, शव पहुंचते ही सक्रिय हो जाता था कथित नेटवर्क
जांच में सामने आया है कि सिम्स अस्पताल में पोस्टमार्टम के लिए जैसे ही किसी मृतक का शव पहुंचता था, वहां तैनात पुलिस चौकी के माध्यम से सूचना कथित गिरोह तक पहुंच जाती थी।

इसी कड़ी में सोमवार को पुलिस ने सिम्स पुलिस चौकी में पदस्थ दो होमगार्ड जवान रामकुमार पाटनवार और रामेश्वर भास्कर को गिरफ्तार किया। पुलिस का आरोप है कि दोनों जवान अस्पताल में आने वाले शवों की सूचना गिरोह के सदस्य महेंद्र मनहर तक पहुंचाते थे।
जांच एजेंसियों के अनुसार सूचना मिलते ही गिरोह सक्रिय हो जाता था और मृतक के परिजनों से संपर्क स्थापित किया जाता था।
मुआवजे का लालच, फिर शुरू होता था पूरा खेल
पुलिस जांच के मुताबिक यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु सामान्य कारणों से भी हुई होती, तब भी परिजनों को यह समझाया जाता था कि यदि मामला सर्पदंश का बना दिया जाए तो शासन से लाखों रुपये का मुआवजा मिल सकता है।
आरोप है कि कई मामलों में परिजन भी इस लालच में कथित रूप से इस षड्यंत्र का हिस्सा बन गए। पुलिस का दावा है कि गिरफ्तार दोनों होमगार्ड केवल सूचना देने तक सीमित नहीं थे, बल्कि परिजनों को कथित गिरोह से जोड़ने और उन्हें तैयार करने में भी सहयोग करते थे।
सिम्स से तहसील तक फैला था कथित सिंडिकेट
प्राथमिक जांच में जिस तरीके का नेटवर्क सामने आया है, उसने जांच एजेंसियों को भी चौंका दिया है।
पुलिस जांच के अनुसार कथित सिंडिकेट की कार्यप्रणाली
- पोस्टमार्टम के लिए शव पहुंचते ही सूचना गिरोह तक पहुंचती थी।
- मृतक के परिजनों को सरकारी मुआवजे का लालच दिया जाता था।
- पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कथित रूप से हेरफेर कर मौत का कारण सर्पदंश दर्शाया जाता था।
- फर्जी पटवारी प्रतिवेदन और अन्य राजस्व दस्तावेज तैयार किए जाते थे।
- तहसील कार्यालय के माध्यम से प्रकरण आगे बढ़ाए जाते थे।
- सक्षम अधिकारी से मुआवजा स्वीकृत होने के बाद राशि बैंक खातों में पहुंचती थी।
- इसके बाद कथित रूप से पूरी राशि का बंटवारा किया जाता था।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कथित हेरफेर कर बदल दी जाती थी मौत की वजह
जांच में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें पोस्टमार्टम रिपोर्ट, मर्ग इंटीमेशन और पटवारी प्रतिवेदन में गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगे हैं।
पुलिस का कहना है कि कुछ मामलों में शवों के साथ कथित छेड़छाड़ कर सर्पदंश के निशान दर्शाने का प्रयास किया गया। इसके बाद पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण बदलकर सर्पदंश बताया गया।
जांच एजेंसियां इस बात की भी पड़ताल कर रही हैं कि कहीं डॉक्टरों के कथित फर्जी हस्ताक्षरों का इस्तेमाल कर प्राकृतिक मौत को भी सर्पदंश दिखाकर सरकारी राहत राशि तो नहीं ली गई।
डॉक्टर, बैंक, तहसील… जांच अब कई विभागों तक पहुंची
मामले में डॉ. प्रियंका सोनी पहले ही गिरफ्तार की जा चुकी हैं। वहीं डॉ. एस.एन. बोले द्वारा जारी पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी जांच के दायरे में है। पुलिस उनके निवास पर दबिश दे चुकी है। बताया गया है कि अवकाश समाप्त होने के बाद भी वे ड्यूटी पर नहीं पहुंचे।
तहसील कार्यालय से जुड़े दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी गोविंद विश्वकर्मा की भूमिका भी जांच में सामने आई है। आरोप है कि वह कथित रूप से प्रकरणों को आगे बढ़ाने और रीडरों की आईडी से फाइलें संचालित कराने में भूमिका निभाता था।
अब तक 15 एफआईआर, कई आरोपी गिरफ्तार
पुलिस अब तक 15 अलग-अलग मामलों में धोखाधड़ी, जालसाजी और फर्जी दस्तावेज तैयार करने सहित विभिन्न धाराओं में अपराध दर्ज कर चुकी है।
गिरफ्तार आरोपियों में हीराप्रसाद खांडेकर, महेंद्र मनहर, कुश कुमार गुप्ता, गोविंद विश्वकर्मा, डॉ. प्रियंका सोनी, गरीब राम बिंझवार, हरिशंकर राठौर, नरेंद्र कौशिक सहित कई अन्य आरोपी शामिल हैं। सोमवार को दो होमगार्ड जवानों की गिरफ्तारी के बाद जांच और तेज हो गई है।
किन-किन थानों में दर्ज हुए अपराध
थाना सरकंडा
- महेंद्र कुमार मनहर
- गोविंद विश्वकर्मा
- हीराप्रसाद खांडेकर
- कुश कुमार गुप्ता
थाना कोनी
- भगत सिंह ठाकुर
- शंकू सिंह ठाकुर
- धर्मेंद्र यादव
- विजय जांगड़े
- आकाश कुमार साहू
- केशव कुमार कश्यप
थाना सिविल लाइन
- कामता साहू (अधिवक्ता)
- शिवकुमारी यादव
- दामिनी यादव
थाना तोरवा
- सफीना बानो
- संतोष कुमार सूर्यवंशी
- रंजीत कुमार चतुर्वेदी
थाना सिटी कोतवाली
- सुनीता सोनवानी
लिपिक संघ ने की हड़ताल, कार्रवाई पर उठाए सवाल
तहसील कर्मचारियों की गिरफ्तारी के विरोध में लिपिक संघ ने एक दिन की हड़ताल की। संघ ने कार्रवाई को एकतरफा बताते हुए पूरे मामले की निष्पक्ष और व्यापक जांच की मांग की।
एसएसपी का स्पष्ट संदेश—”जो दोषी होगा, वह बचेगा नहीं”

एसएसपी रजनेश सिंह ने कहा कि प्रारंभिक जांच में अधिवक्ता और उसके सहयोगियों द्वारा संगठित सिंडिकेट बनाकर काम करने के संकेत मिले हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि जांच में जिसकी भी संलिप्तता सामने आएगी, उसके विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।
अब सबसे बड़ा सवाल—क्या जांच तहसीलदार और एसडीएम तक पहुंचेगी?
यहीं से यह पूरा मामला सबसे संवेदनशील हो जाता है। प्रशासनिक प्रक्रिया के अनुसार किसी भी सर्पदंश मुआवजा प्रकरण में केवल पटवारी प्रतिवेदन पर्याप्त नहीं होता। दस्तावेजों की जांच, राजस्व परीक्षण और सक्षम अधिकारी की स्वीकृति के बाद ही सरकारी मुआवजा जारी किया जाता है।
ऐसे में अब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिन मामलों में कथित रूप से फर्जी दस्तावेजों के आधार पर मुआवजा स्वीकृत हुआ, उनमें क्या प्रशासनिक स्तर पर किसी प्रकार की लापरवाही हुई, नियमों की अनदेखी हुई या किसी अन्य स्तर पर अनियमितता हुई? इन सभी पहलुओं की पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी।
जांच के केंद्र में अब ये बड़े सवाल
- शव की पहली सूचना आखिर किस स्तर से लीक होती थी?
- पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कथित हेरफेर किसके संरक्षण में हुई?
- फर्जी पटवारी प्रतिवेदन किस स्तर पर तैयार किए गए?
- मुआवजा प्रकरणों की प्रशासनिक जांच कितनी गहन थी?
- सरकारी धन जारी होने से पहले दस्तावेजों का सत्यापन किसने किया?
- क्या जांच अब तहसीलदार, एसडीएम और पूरी प्रशासनिक श्रृंखला तक पहुंचेगी?
- क्या विष्णुदेव साय सरकार अपनी ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति पर पूरी तरह अमल करते हुए जिम्मेदारी तय करेगी?
(नोट : यह समाचार अब तक पुलिस जांच, दर्ज प्रकरणों और अधिकारियों के सार्वजनिक बयानों पर आधारित है। तहसीलदार, एसडीएम अथवा किसी अन्य राजपत्रित अधिकारी की भूमिका के संबंध में कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं निकला है। उनकी जिम्मेदारी या संलिप्तता जांच पूरी होने और सक्षम एजेंसियों की आधिकारिक कार्रवाई के बाद ही स्पष्ट होगी।)



