सर्पदंश मुआवजा घोटाले में नया मोड़: तीन लिपिकों की गिरफ्तारी के विरोध में सड़क पर उतरा कर्मचारी संघ, पुलिस जांच पर उठाए गंभीर सवाल

बिलासपुर ( शिखर दर्शन ) // बहुचर्चित सर्पदंश मृत्यु मुआवजा घोटाले की जांच के बीच अब मामला नया मोड़ लेता नजर आ रहा है। बिलासपुर तहसील के तीन लिपिकों की गिरफ्तारी के विरोध में सोमवार को छत्तीसगढ़ प्रदेश लिपिक वर्गीय शासकीय कर्मचारी संघ खुलकर मैदान में उतर आया। संघ ने कलेक्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुंचकर प्रदर्शन किया तथा कलेक्टर और एसपी के नाम ज्ञापन सौंपते हुए पुलिस कार्रवाई को एकतरफा बताया। संघ ने दावा किया कि संबंधित कर्मचारी केवल कार्यालयीन प्रक्रिया का निर्वहन कर रहे थे और अंतिम निर्णय लेने का अधिकार उनके पास नहीं था।
प्रदेश अध्यक्ष बोले— उच्च अधिकारियों के आदेश पर होता है काम
संघ के प्रदेश अध्यक्ष रोहित तिवारी के नेतृत्व में कर्मचारियों ने कहा कि तहसील कार्यालय में पदस्थ नरेंद्र कुमार कौशिक, हरिशंकर राठौर और गरीबराम बिंझवार को बयान दर्ज कराने के नाम पर सरकंडा थाना बुलाया गया। आरोप लगाया गया कि तीनों कर्मचारियों को बिना वैधानिक नोटिस दिए दो से तीन दिनों तक थाने में बैठाकर पूछताछ की गई और बाद में न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया गया।
“लिपिकों के पास निर्णय लेने का अधिकार ही नहीं”
कर्मचारी संघ ने ज्ञापन में स्पष्ट किया कि आरबीसी 6-4 के तहत सर्पदंश मृत्यु मुआवजा प्रकरणों में लिपिकों की भूमिका केवल कार्यालयीन अभिलेखों के संधारण और फाइल प्रक्रिया तक सीमित होती है। किसी भी प्रकरण में मुआवजा स्वीकृत करने अथवा अंतिम निर्णय लेने का अधिकार तहसीलदार, अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) तथा अन्य सक्षम अधिकारियों के पास होता है।
संघ का कहना है कि केवल संदेह के आधार पर लिपिकों को आरोपी बनाना न्यायोचित नहीं है और पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
आरबीसी 6-4 की प्रक्रिया बताकर रखा पक्ष
कर्मचारी संघ ने ज्ञापन में सर्पदंश मुआवजा स्वीकृति की पूरी प्रक्रिया का उल्लेख करते हुए बताया कि—
- सबसे पहले संबंधित थाना में प्रकरण दर्ज होता है।
- पुलिस पंचनामा तैयार कर शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजती है।
- पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर मृतक के परिजन मुआवजे के लिए आवेदन प्रस्तुत करते हैं।
- आवेदन तहसील कार्यालय पहुंचने के बाद जांच के लिए पटवारी को भेजा जाता है।
- पटवारी प्रतिवेदन प्रस्तुत करता है।
- इसके बाद राजस्व निरीक्षक और नायब तहसीलदार स्तर पर परीक्षण होता है।
- अंत में तहसीलदार एवं एसडीएम की स्वीकृति के बाद ही मुआवजा आदेश जारी किया जाता है।
संघ का कहना है कि पूरी प्रक्रिया में लिपिक केवल कार्यालयीन कार्यवाही करते हैं, निर्णय लेने की शक्ति उनके पास नहीं होती।
राजस्व विभाग का काम ठप करने की चेतावनी
कर्मचारी संघ ने चेतावनी दी है कि यदि निष्पक्ष जांच नहीं हुई और निर्दोष कर्मचारियों के साथ इसी प्रकार की कार्रवाई जारी रही तो राजस्व विभाग के कर्मचारी आंदोलन तेज करेंगे। आवश्यकता पड़ने पर विभागीय कामकाज प्रभावित करने का भी निर्णय लिया जा सकता है।
संघ की प्रमुख मांगें
- गिरफ्तार तीनों कर्मचारियों के विरुद्ध की गई कार्रवाई की निष्पक्ष समीक्षा की जाए।
- बिना पर्याप्त साक्ष्य केवल संदेह के आधार पर कर्मचारियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई न की जाए।
- पूरे प्रकरण की सभी स्तरों पर निष्पक्ष एवं विधिसम्मत जांच कराई जाए।
जांच पहले से जारी, पुलिस ने लगाए हैं गंभीर आरोप
उल्लेखनीय है कि बहुचर्चित सर्पदंश मृत्यु मुआवजा घोटाले की जांच पहले से जारी है। पुलिस का आरोप है कि फर्जी दस्तावेजों और कथित रूप से तैयार पोस्टमार्टम रिपोर्टों के आधार पर सरकारी मुआवजा स्वीकृत कराया गया। इस मामले में सिम्स की पूर्व चिकित्सक सहित कई आरोपी पहले ही गिरफ्तार किए जा चुके हैं। वहीं हाल ही में एसडीएम कार्यालय और तहसील कार्यालय के तीन लिपिकों की गिरफ्तारी के बाद अब कर्मचारी संगठन उनके समर्थन में खुलकर सामने आ गए हैं।
नोट: कर्मचारी संघ द्वारा लगाए गए आरोप और मांगें उनके ज्ञापन तथा सार्वजनिक बयान पर आधारित हैं। मामले की जांच पुलिस द्वारा जारी है और आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होगा।



