बिलासपुर संभाग

निर्वाचन कार्य का बढ़ता दबाव : महिला सुपरवाइजर ड्यूटी के दौरान बेहोश, दोहरे काम के बोझ ने बिगाड़ी सेहत

SIR प्रक्रिया में तेजी लाने की होड़ ने कर्मचारियों पर बढ़ाया तनाव, विभागीय दबाव और अव्यवस्थित कार्य-प्रणाली बनी हादसे का कारण; SDM पहुंचे अस्पताल, इलाज जारी

बिलासपुर ( शिखर दर्शन ) //
सरकार द्वारा संचालित निर्वाचन कार्य—विशेषकर SIR प्रक्रिया—को निर्धारित समय सीमा में पूरा करने के दबाव ने कर्मचारियों की मानवीय संवेदनाओं और कार्य स्थितियों को पूरी तरह हाशिये पर धकेल दिया है। इसी अव्यवस्थित व्यवस्था का कड़वा परिणाम रविवार शाम उस समय सामने आया, जब वार्ड क्रमांक 29, जोन 4 में निर्वाचन कार्य में जुटी आंगनबाड़ी सुपरवाइजर श्रीमती गीता कृष्णनन ड्यूटी करते हुए अचानक बेहोश होकर गिर पड़ीं। सौभाग्य से यह घटना सड़क पर डोर-टू-डोर सर्वे के दौरान नहीं हुई, वरना कोई बड़ी दुर्घटना हो सकती थी।

सूत्रों के मुताबिक, श्रीमती कृष्णनन लगभग 9 BLO की टीम की पर्यवेक्षक के रूप में निर्वाचन कार्य में जुटी थीं। सुबह से ही वे अत्यधिक मानसिक दबाव में थीं, क्योंकि उनके मूल विभाग—आंगनबाड़ी—की सुपरवाइजर दीप्ति पटेल ने निर्वाचन कार्य के अलावा विभागीय कार्य भी उसी दिन करने का दबाव बनाया था। दोनों काम एक साथ न कर पाने पर उन्हें साक्ष्य सहित स्पष्टीकरण नोटिस भी दे दिया गया था, जिससे उनका मानसिक तनाव और बढ़ गया।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार शाम को जब वे तारबाहर स्थित दुर्गा पंडाल में SIR संबंधित कार्य कर रही थीं, तभी अचानक मूर्छित होकर गिर पड़ीं। मौके पर मौजूद लोगों और सहकर्मियों ने उन्हें तत्काल अस्पताल पहुंचाया। घटना की जानकारी मिलते ही SDM बिलासपुर सहित अन्य अधिकारी अस्पताल पहुंचे और इलाज की व्यवस्था सुनिश्चित की।


निर्वाचन कार्य में “अमानवीय दबाव” की पोल खोलता हुआ मामला

SIR प्रक्रिया को समय से पूरा करने के लिए सरकार द्वारा तय की गई कम समय-सीमा जमीनी स्तर पर लगभग असंभव साबित हो रही है। अधिकारी समय-सीमा का हवाला देते हुए अपने अधीनस्थों पर इस कदर दबाव बना रहे हैं कि कर्मचारी मानो बंधुआ मजदूर की तरह काम करने को मजबूर हो रहे हैं।

कई जिलों से ऐसी खबरें सामने आ रही हैं कि अत्यधिक दबाव के कारण कर्मचारी बेहोश हो रहे हैं, मानसिक तनाव से जूझ रहे हैं, और कुछ मामलों में आत्महत्या तक की नौबत आ रही है।


मैदानी कर्मचारियों की पीड़ा—“कहीं शौचालय नहीं, न पानी, न भोजन का समय”

जमीनी स्तर पर कार्य कर रहे कर्मचारियों की स्थिति बेहद दयनीय है—

  • महिला कर्मचारी सुबह 9 बजे से फील्ड में रहती हैं, लेकिन भोजन का समय तक नहीं मिलता।
  • शिविरों में न शौचालय की व्यवस्था, न पीने के पानी की।
  • दिनभर की दौड़भाग के बाद भी विभागीय फटकार, डर और धमकी ही नसीब होती है।
  • पुरुष कर्मचारी भी समान परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं।

अधिकारियों को यह समझना होगा कि यह कार्य बेहद संवेदनशील है और इसे भय बनाकर नहीं, बल्कि सहयोग और समन्वय के साथ पूरा किया जाना चाहिए।


अधिकारियों की जवाबदेही पर उठते सवाल

बड़े अधिकारी वातानुकूलित कक्षों या सरकारी गाड़ियों में बैठकर निर्देश देते रहते हैं। लेकिन उन्हें जमीनी हकीकत का अंदाजा नहीं—

  • कर्मचारी सूरज की तेज धूप या बारिश में घंटों घर-घर सर्वे कर रहे हैं।
  • बिना उचित सुविधाओं के काम कर रहे हैं।
  • फिर भी समय-सीमा के नाम पर प्रताड़ना झेल रहे हैं।

यह घटना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि प्रशासन को तत्काल जमीनी हालात को समझते हुए व्यवस्था सुधारने की जरूरत है।


बदलाव की जरूरत

श्रीमती गीता कृष्णनन की घटना सिर्फ एक उदाहरण नहीं, बल्कि उस भारी अव्यवस्था की तस्वीर है, जिससे देशभर के निर्वाचन कर्मचारी गुजर रहे हैं। सरकार और उच्च अधिकारी यदि संवेदनशीलता नहीं दिखाएंगे, तो ऐसे हादसे बढ़ते ही रहेंगे।

फिलहाल प्रशासन ने इलाज की व्यवस्था की है, लेकिन यह समय है कि सरकार और विभागीय अधिकारी मैदानी कर्मचारियों की वास्तविक समस्याओं का समाधान करें और उनकी मानविक गरिमा को प्राथमिकता दें।

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