बिलासपुर संभाग

सर्पदंश मुआवजा घोटाला: अब बड़े अफसरों तक कब पहुंचेगी जांच ?

डॉक्टर, बाबू, होमगार्ड और बिचौलिए सलाखों के पीछे… करोड़ों का मुआवजा मंजूर करने वाली प्रशासनिक चेन पर सबसे बड़े सवाल, ‘जीरो टॉलरेंस’ की होगी असली परीक्षा

बिलासपुर ( शिखर दर्शन ) // बहुचर्चित सर्पदंश मुआवजा घोटाले की जांच अब उस मोड़ पर पहुंच गई है, जहां सवाल केवल गिरफ्तार आरोपियों का नहीं, बल्कि उस पूरी प्रशासनिक व्यवस्था का है, जिसके माध्यम से कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर करोड़ों रुपये का सरकारी मुआवजा स्वीकृत हुआ। अब तक डॉक्टर, बाबू, बैंककर्मी, होमगार्ड, वाहन चालक और कथित बिचौलियों की गिरफ्तारी हो चुकी है, लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न अब भी अनुत्तरित है—क्या जांच उन अधिकारियों तक भी पहुंचेगी, जिनकी अनुशंसा और आदेश के बाद सरकारी राशि जारी हुई ?

प्रदेश सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति का दावा करती रही है। ऐसे में यह मामला अब उस दावे की सबसे बड़ी परीक्षा माना जा रहा है। शहर से लेकर प्रशासनिक गलियारों तक एक ही चर्चा है कि क्या कार्रवाई केवल निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित रहेगी, या उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर जांच प्रशासनिक श्रृंखला के उच्च स्तर तक भी पहुंचेगी।

गिरफ्तारियां लगातार बढ़ीं, लेकिन सवाल भी उतने ही बड़े

अब तक दर्ज 15 अलग-अलग अपराधों में कई आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। सिम्स की पूर्व चिकित्सक डॉ. प्रियंका सोनी जेल में हैं। एसडीएम कार्यालय और तहसील कार्यालय के लिपिकों को गिरफ्तार किया जा चुका है। कथित बिचौलिए, बैंककर्मी और होमगार्ड जवान भी पुलिस कार्रवाई के दायरे में आ चुके हैं। इसके बावजूद यह सवाल लगातार उठ रहा है कि क्या करोड़ों रुपये का सरकारी भुगतान केवल निचले कर्मचारियों के भरोसे संभव था ?

प्रशासनिक प्रक्रिया से जुड़े जानकारों का कहना है कि राजस्व राहत का कोई भी प्रकरण कई स्तरों की जांच, परीक्षण और स्वीकृति के बाद ही अंतिम आदेश तक पहुंचता है। यही कारण है कि अब पूरी प्रशासनिक श्रृंखला पर भी निगाहें टिक गई हैं।

सिम्स से एसडीएम कार्यालय तक… कथित नेटवर्क की पूरी चेन जांच के केंद्र में

पुलिस की अब तक की विवेचना के अनुसार जैसे ही कोई शव पोस्टमार्टम के लिए सिम्स पहुंचता था, उसकी सूचना कथित रूप से नेटवर्क तक पहुंच जाती थी। आरोप है कि इसके बाद मृतक के परिजनों को शासन से मिलने वाले चार लाख रुपये के मुआवजे का लालच देकर सर्पदंश का मामला तैयार किया जाता था।

इसके बाद कथित तौर पर—

  • पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार होती,
  • मर्ग इंटीमेशन में आवश्यक प्रविष्टियां होतीं,
  • पटवारी प्रतिवेदन तैयार होता,
  • राजस्व अभिलेख संलग्न किए जाते,
  • तहसील स्तर पर परीक्षण होता,
  • एसडीएम कार्यालय में प्रक्रिया आगे बढ़ती,
  • और अंततः मुआवजा स्वीकृत कर राशि जारी हो जाती।

यदि जांच में यह क्रम सही पाया जाता है, तो यह केवल फर्जी दस्तावेजों का मामला नहीं, बल्कि पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया के कथित दुरुपयोग का मामला बन सकता है।

हर स्तर पर क्या हुआ सत्यापन ?

राजस्व नियमों के अनुसार सर्पदंश मृत्यु मुआवजा देने की प्रक्रिया कई चरणों से गुजरती है—

  • पुलिस द्वारा एफआईआर और पंचनामा,
  • पोस्टमार्टम,
  • आवश्यक होने पर बिसरा परीक्षण,
  • परिजनों का आवेदन,
  • पटवारी जांच,
  • राजस्व निरीक्षक एवं नायब तहसीलदार स्तर का परीक्षण,
  • तहसीलदार की अनुशंसा,
  • एसडीएम स्तर पर स्वीकृति की प्रक्रिया,
  • और उसके बाद सक्षम प्राधिकारी द्वारा राशि जारी की जाती है।

ऐसे में यदि कथित फर्जी मामलों में भी भुगतान हुआ, तो जांच का सबसे महत्वपूर्ण विषय यही होगा कि प्रत्येक स्तर पर दस्तावेजों का परीक्षण किस प्रकार किया गया।

अब तक गिरफ्तार आरोपी

  • डॉ. प्रियंका सोनी (पूर्व चिकित्सक)
  • महेंद्र मनहर
  • गोविंद विश्वकर्मा
  • हीराप्रसाद खांडेकर
  • कुश कुमार गुप्ता
  • नरेंद्र कौशिक
  • हरिशंकर राठौर
  • गरीबराम बिंझवार
  • रामकुमार पाटनवार
  • रामेश्वर भास्कर
  • अन्य आरोपी (जिनकी भूमिका की जांच जारी है)

क्या राजपत्रित अधिकारियों तक पहुंचेगी जांच ?

सबसे बड़ा प्रश्न अब यही है कि क्या जांच केवल गिरफ्तार कर्मचारियों तक सीमित रहेगी या उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर राजपत्रित अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आएगी। फिलहाल किसी अधिकारी की जिम्मेदारी तय नहीं हुई है और न ही किसी वरिष्ठ अधिकारी के विरुद्ध कार्रवाई की आधिकारिक घोषणा हुई है। अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएंगे।

क्या थाना स्तर की जांच पर्याप्त है ?

यह मामला स्वास्थ्य विभाग, पुलिस, राजस्व विभाग, बैंकिंग प्रणाली और आपदा राहत तंत्र से जुड़ा है। ऐसे में प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा भी तेज है कि क्या इतने व्यापक प्रकरण की जांच केवल थाना स्तर पर पर्याप्त होगी, या किसी उच्च स्तरीय एजेंसी अथवा विशेष जांच दल की आवश्यकता पड़ेगी।

लिपिक संघ ने भी उठाए सवाल

तीन लिपिकों की गिरफ्तारी के विरोध में कर्मचारी संघ ने प्रदर्शन कर आरोप लगाया कि कार्रवाई एकतरफा प्रतीत होती है। संघ का कहना है कि यदि पूरी प्रक्रिया की जांच हो रही है तो सभी स्तरों की भूमिका की निष्पक्ष जांच की जानी चाहिए।

कलेक्टर और एसएसपी के बयान पर टिकी निगाहें

कलेक्टर संजय अग्रवाल ने कहा है कि यदि किसी ने गलत मंशा से कार्य किया है तो “चाहे कोई भी हो, उसके विरुद्ध कार्रवाई होगी।”

वहीं एसएसपी रजनेश सिंह ने स्पष्ट किया है कि जांच में संगठित नेटवर्क के संकेत मिले हैं और जिसकी भी संलिप्तता सामने आएगी, उसके विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।

अब जांच के सामने सबसे बड़े सवाल

  • शव की सूचना सबसे पहले किस स्तर से बाहर जाती थी ?
  • पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कथित हेरफेर कैसे हुआ ?
  • पटवारी प्रतिवेदन किस आधार पर तैयार हुए ?
  • तहसील स्तर पर दस्तावेजों का परीक्षण किस प्रकार हुआ ?
  • एसडीएम कार्यालय तक पहुंचने वाले प्रकरणों की जांच कितनी गहन थी ?
  • सरकारी राशि जारी होने से पहले अंतिम सत्यापन किस स्तर पर हुआ ?
  • क्या राजस्व न्यायालय के समक्ष कथित फर्जी दस्तावेज प्रस्तुत किए गए ?
  • क्या जांच प्रशासनिक श्रृंखला के उच्च स्तर तक पहुंचेगी ?

सर्पदंश मुआवजा घोटाला अब केवल फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट या कुछ कर्मचारियों की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रह गया है। यह मामला प्रशासनिक जवाबदेही, सरकारी धन के उपयोग और पूरी राजस्व प्रक्रिया की पारदर्शिता की कसौटी बन चुका है। अब सभी की निगाहें इस बात पर हैं कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर जांच का दायरा कितना आगे बढ़ता है और क्या कथित करोड़ों रुपये के इस फर्जीवाड़े में शामिल हर जिम्मेदार व्यक्ति तक कानून का शिकंजा पहुंचता है।

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