पुलिस ‘बड़ी मछलियों’ की तलाश में , अफसरों ने मांगा कानूनी संरक्षण , 17.24 करोड़ के सर्पदंश मुआवजा प्रकरण में नया मोड़

आईजी की निगरानी में जांच हुई और तेज; 431 संदिग्ध मौतों और मुआवजा प्रक्रिया की हर कड़ी की पड़ताल जारी
बिलासपुर ( शिखर दर्शन ) // छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित सर्पदंश मुआवजा प्रकरण में अब घटनाक्रम केवल गिरफ्तारियों तक सीमित नहीं रह गया है। ₹17.24 करोड़ से अधिक की मुआवजा राशि के वितरण से जुड़े इस मामले में पुलिस की जांच लगातार गहराती जा रही है, वहीं दूसरी ओर छत्तीसगढ़ राज्य प्रशासनिक सेवा संघ ने राजस्व अधिकारियों के विरुद्ध आपराधिक कार्रवाई की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाते हुए उन्हें विधिक संरक्षण देने की मांग की है। इससे जांच और प्रशासनिक तंत्र के बीच मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं।
इधर बिलासपुर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक रामगोपाल गर्ग स्वयं पूरे मामले की निगरानी कर रहे हैं। जांच का दायरा अब केवल फर्जी दस्तावेजों तक सीमित नहीं रहकर स्वास्थ्य विभाग, पुलिस, राजस्व विभाग, बैंकिंग प्रणाली और मुआवजा स्वीकृति की संपूर्ण प्रक्रिया तक पहुंच गया है।
प्रशासनिक सेवा संघ ने मुख्यमंत्री के नाम सौंपा ज्ञापन
छत्तीसगढ़ राज्य प्रशासनिक सेवा संघ की जिला इकाई ने संभागायुक्त के माध्यम से मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपते हुए कहा है कि प्राकृतिक आपदा राहत प्रकरणों में उपलब्ध शासकीय अभिलेखों के आधार पर वैधानिक आदेश पारित करने वाले राजस्व अधिकारियों को सीधे आपराधिक जांच के दायरे में लाना उचित नहीं है।
संघ का कहना है कि यदि किसी प्रकरण में फर्जी शपथपत्र, जाली पोस्टमार्टम रिपोर्ट, कूटरचित दस्तावेज अथवा अन्य गलत अभिलेख प्रस्तुत किए गए हैं तो कार्रवाई उन लोगों पर होनी चाहिए जिन्होंने ऐसे दस्तावेज तैयार किए, प्रमाणित किए या न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए।
‘Fraud upon the Court’ मानकर कार्रवाई की मांग
ज्ञापन में प्रशासनिक सेवा संघ ने मांग की है कि ऐसे मामलों को केवल सामान्य धोखाधड़ी न मानकर न्यायालय के साथ धोखाधड़ी (Fraud upon the Court) की श्रेणी में रखा जाए तथा भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराओं के तहत प्रभावी विवेचना और अभियोजन सुनिश्चित किया जाए।
संघ ने यह भी कहा कि न्यायाधीश (संरक्षण) अधिनियम तथा राज्य शासन के दिशा-निर्देशों के अनुसार राजस्व न्यायालयों के पीठासीन अधिकारियों को विधिक संरक्षण प्राप्त है। केवल न्यायिक आदेश के आधार पर उनके विरुद्ध आपराधिक उत्तरदायित्व तय नहीं किया जाना चाहिए।
पुलिस अधिकारियों के लिए एसओपी बनाने की मांग
संघ ने राज्य सरकार से आग्रह किया है कि प्राकृतिक आपदा राहत से जुड़े मामलों की जांच के लिए स्पष्ट स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) बनाई जाए, जिससे पुलिस, स्वास्थ्य विभाग और राजस्व विभाग के बीच समन्वित जांच व्यवस्था विकसित हो सके तथा भविष्य में विवाद की स्थिति उत्पन्न न हो।
आईजी की सीधी मॉनिटरिंग में तेज हुई जांच
दूसरी ओर पुलिस ने जांच की गति और बढ़ा दी है। बिलासपुर रेंज के आईजी रामगोपाल गर्ग ने विवेचना की समीक्षा करते हुए अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि प्रत्येक दस्तावेज, डिजिटल रिकॉर्ड, बैंक लेन-देन, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और फॉरेंसिक रिपोर्ट का सूक्ष्म परीक्षण किया जाए, ताकि न्यायालय में मजबूत अभियोजन प्रस्तुत किया जा सके।
431 संदिग्ध मौतें और ₹17.24 करोड़ की जांच
अब तक की जांच में 431 संदिग्ध मृत्यु प्रकरणों के आधार पर ₹17.24 करोड़ से अधिक की मुआवजा राशि जारी होने की प्रक्रिया की जांच की जा रही है।
जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि—
- कथित फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट कैसे तैयार हुई।
- मर्ग संबंधी दस्तावेजों में किस स्तर पर बदलाव हुआ।
- राजस्व अभिलेख किस आधार पर तैयार किए गए।
- मुआवजा स्वीकृति तक फाइलें किन-किन स्तरों से होकर गुजरीं।
- कथित कमीशन की राशि किन लोगों तक पहुंची।
सिम्स से तहसील कार्यालय तक खंगाली जा रही हर कड़ी
जांच में यह भी पड़ताल की जा रही है कि पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल पहुंचने वाले शवों से संबंधित सूचनाएं किस प्रकार आगे पहुंचती थीं और उसके बाद मुआवजा प्रक्रिया किस क्रम में संचालित होती थी।

पुलिस पोस्टमार्टम रिपोर्ट, मर्ग दस्तावेज, पटवारी प्रतिवेदन, तहसील स्तर की जांच, एसडीएम की अनुशंसा तथा अंतिम स्वीकृति तक पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया का परीक्षण कर रही है।
सबसे बड़ा सवाल—हर स्तर की जांच के बाद भुगतान कैसे हुआ?
प्राकृतिक आपदा राहत के अंतर्गत सर्पदंश से मृत्यु पर मुआवजा स्वीकृत करने की प्रक्रिया में पुलिस, स्वास्थ्य विभाग और राजस्व विभाग की कई स्तरों की जांच शामिल रहती है।
ऐसी स्थिति में जांच एजेंसियां यह जानने का प्रयास कर रही हैं कि यदि कथित रूप से फर्जी मामलों में भुगतान हुआ तो प्रत्येक स्तर पर दस्तावेजों का परीक्षण किस प्रकार किया गया और प्रक्रिया में कहां चूक हुई।
स्वास्थ्य विभाग और पुलिस की भूमिका भी जांच के घेरे में
अब जांच का फोकस केवल राजस्व विभाग तक सीमित नहीं है। मर्ग रिपोर्ट और पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया में पुलिस एवं स्वास्थ्य विभाग की भूमिका का भी परीक्षण किया जा रहा है।
साथ ही सिम्स अस्पताल के मॉर्च्युरी से जुड़े कर्मचारियों तथा तहसील कार्यालय की मुआवजा शाखा में पदस्थ कर्मचारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में है।
तहसीलदारों और पटवारियों से पूछताछ फिलहाल स्थगित
मुआवजा प्रक्रिया से जुड़े तहसीलदारों और पटवारियों से प्रस्तावित पूछताछ फिलहाल आगे नहीं बढ़ सकी है। हालांकि पुलिस का कहना है कि विवेचना के दौरान आवश्यकता पड़ने पर सभी संबंधित पक्षों से पूछताछ की जाएगी।
जेल में बंद आरोपियों की भूमिका का भी हो रहा मिलान
अब तक गिरफ्तार किए गए सभी आरोपियों की अन्य मामलों में संभावित भूमिका की भी जांच की जा रही है। पुलिस मोबाइल डेटा, बैंक खातों और डिजिटल रिकॉर्ड का विश्लेषण कर यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि क्या इसी कार्यप्रणाली का उपयोग अन्य मामलों में भी किया गया था।
अब तक कई आरोपी गिरफ्तार
इस बहुचर्चित प्रकरण में अब तक चिकित्सक, शासकीय कर्मचारी तथा अन्य कई आरोपियों सहित अनेक लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। पुलिस का कहना है कि जांच अभी जारी है और पूरे कथित नेटवर्क की संरचना को सामने लाने के लिए साक्ष्य जुटाए जा रहे हैं।
राजपत्रित अधिकारियों की भूमिका पर भी बनी हुई है नजर
जांच एजेंसियां मुआवजा प्रक्रिया में शामिल विभिन्न स्तरों की प्रशासनिक जिम्मेदारियों का भी परीक्षण कर रही हैं। हालांकि अब तक किसी राजपत्रित अधिकारी की जिम्मेदारी आधिकारिक रूप से निर्धारित नहीं की गई है और न ही उनके विरुद्ध किसी कार्रवाई की घोषणा की गई है। पुलिस का कहना है कि विवेचना निष्पक्ष रूप से जारी है तथा उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।



