भरण-पोषण की शर्त लिखित न हो तब भी रद्द हो सकता है गिफ्ट डीड

वरिष्ठ नागरिकों की उपेक्षा पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला , अपील खारिज
बिलासपुर (शिखर दर्शन) //
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों को लेकर एक अहम निर्णय देते हुए स्पष्ट किया है कि यदि किसी बुजुर्ग द्वारा रिश्तेदार के पक्ष में की गई गिफ्ट डीड में भरण-पोषण की शर्त लिखित रूप में दर्ज न हो, तब भी परिस्थितियों और बाद के आचरण से यदि देखभाल की जिम्मेदारी साबित होती है, तो ऐसी गिफ्ट डीड को Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007 की धारा 23 के तहत निरस्त किया जा सकता है।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाते हुए रिट अपील को खारिज कर दिया और एकल पीठ के आदेश को बरकरार रखा।
क्या था मामला
वरिष्ठ नागरिकों (प्रतिवादी क्रमांक 2 व 3) ने अपने रिश्तेदार के पक्ष में वर्ष 2016 में एक आवासीय संपत्ति गिफ्ट की थी। बाद में आरोप लगा कि गिफ्ट पाने वालों ने न केवल उनकी देखभाल बंद कर दी, बल्कि उन्हें घर से बेदखल कर दिया, जिससे उन्हें बिलासपुर के सरकंडा स्थित वृद्धाश्रम में रहना पड़ा।
इस पर वरिष्ठ नागरिकों ने भरण-पोषण न्यायाधिकरण के समक्ष आवेदन दिया, जहां गिफ्ट डीड को रद्द कर दिया गया। इस आदेश को पहले अपीलीय न्यायाधिकरण और फिर एकल पीठ ने भी सही ठहराया।
अपीलकर्ताओं की दलील
अपीलकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव श्रीवास्तव ने जोरदार बहस करते हुए कहा कि—
- गिफ्ट डीड में कहीं भी भरण-पोषण की शर्त दर्ज नहीं है
- वरिष्ठ नागरिक पेंशन प्राप्त करते हैं और आर्थिक रूप से सक्षम हैं
- धारा 23 का प्रयोग केवल तभी हो सकता है जब गिफ्ट सशर्त हो
- न्यायाधिकरण का गठन और प्रक्रिया भी त्रुटिपूर्ण थी
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय Sudesh Chhikara बनाम Ramti Devi का हवाला देते हुए आदेश को अवैध बताया।
राज्य और वरिष्ठ नागरिकों का पक्ष
राज्य शासन की ओर से शासकीय अधिवक्ता प्रियंक राठी ने आदेश का समर्थन किया। वहीं वरिष्ठ नागरिकों की ओर से अधिवक्ता विक्रांत पिल्ले ने दलील दी कि—
- यह कानून वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा के लिए बना है, इसका उदार और उद्देश्यपूर्ण अर्थ निकाला जाना चाहिए
- केवल पेंशन मिलना यह साबित नहीं करता कि बुजुर्गों की देखभाल हो रही है
- घर से बेदखली और बुनियादी सुविधाओं से वंचित करना स्वयं में उपेक्षा है
- भरण-पोषण की शर्त परिस्थितियों से भी सिद्ध हो सकती है
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसलों Urmila Dixit बनाम Sunil Dixit और Ajay Singh बनाम Khacheru का हवाला दिया।
हाईकोर्ट का स्पष्ट निष्कर्ष
हाईकोर्ट ने कहा कि—
- भरण-पोषण न्यायाधिकरण का गठन विधि के अनुरूप था
- कार्यवाही संक्षिप्त (summary) प्रकृति की होती है, इसे दीवानी मुकदमे की तरह नहीं चलाया जा सकता
- गिफ्ट प्रेम, विश्वास और देखभाल की अपेक्षा में किया गया था
- बाद का आचरण यह साबित करता है कि वरिष्ठ नागरिकों की उपेक्षा हुई
अदालत ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण की जिम्मेदारी लिखित शर्त न होने पर भी परिस्थितिजन्य रूप से सिद्ध हो सकती है।
अपील खारिज, आदेश बरकरार
इन सभी तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने अपील को खारिज करते हुए कहा कि—
- न तो आदेश में कोई अवैधता है
- न ही अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन
- न ही किसी प्रकार की मनमानी
अंतरिम आदेश भी समाप्त कर दिया गया है और लागत के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया गया।
हेडनोट (Head Note):
वरिष्ठ नागरिकों द्वारा किए गए गिफ्ट डीड को धारा 23 के तहत तब भी निरस्त किया जा सकता है, जब उसमें भरण-पोषण की शर्त लिखित न हो, यदि परिस्थितियाँ और आचरण देखभाल की जिम्मेदारी के उल्लंघन को दर्शाते हों—छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट।




