सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के विरोध में जवाहर लाल नेहरू ने लिखे थे 17 लेटर, बीजेपी ने साझा किया दस्तावेज , बताया – आजाद भारत में सोमनाथ से सबसे अधिक नफरत पंडित नेहरू को थी

देश गुजरात स्थित सोमनाथ मंदिर के विध्वंस से लेकर पुनरुत्थान तक आस्था के एक हजार वर्षों के इतिहास का उत्सव मना रहा है। इसी बीच सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण को लेकर एक बार फिर सियासत गरमा गई है। भारतीय जनता पार्टी ने पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू पर तीखा हमला बोला है, जबकि कांग्रेस ने इन आरोपों को पूरी तरह निराधार करार दिया है।
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने दावा किया है कि सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के विरोध में जवाहरलाल नेहरू ने कुल 17 पत्र लिखे थे। त्रिवेदी के अनुसार, इनमें से कई पत्र पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को भेजे गए थे। उन्होंने आरोप लगाया कि नेहरू तुष्टीकरण की राजनीति के चलते स्वतंत्रता के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के पक्ष में नहीं थे।
सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि इतिहास में महमूद गजनवी और अलाउद्दीन खिलजी द्वारा सोमनाथ मंदिर को लूटे जाने की बात कही जाती है, लेकिन स्वतंत्र भारत में भगवान सोमनाथ के प्रति सबसे अधिक विरोध तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू के रुख में दिखाई देता है। उन्होंने 21 अप्रैल 1951 के एक पत्र का हवाला देते हुए कहा कि नेहरू ने लियाकत अली खान को ‘प्रिय नवाबज़ादा’ संबोधित किया और सोमनाथ मंदिर से जुड़े ऐतिहासिक दावों को झूठा बताया। भाजपा प्रवक्ता का आरोप है कि इस पत्र के माध्यम से नेहरू ने यह संदेश देने की कोशिश की कि सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण जैसी कोई योजना नहीं है।
भाजपा नेता ने सवाल उठाया कि आखिर नेहरू को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को सोमनाथ मंदिर के मुद्दे पर पत्र लिखने की आवश्यकता क्यों पड़ी। उन्होंने इसे अंध तुष्टीकरण की राजनीति करार देते हुए कहा कि यह मुगल आक्रमणकारियों के महिमामंडन का उदाहरण है।
त्रिवेदी ने यह भी दावा किया कि नेहरू ने राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और मंत्रियों को लिखे पत्रों में सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन समारोह में शामिल न होने की कड़ी चेतावनी दी थी। भारतीय मुख्यमंत्रियों को भेजे गए पत्रों में मंदिर के भव्य पुनर्निर्माण पर आपत्ति जताते हुए कहा गया कि इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को नुकसान पहुंच सकता है। इतना ही नहीं, भारतीय दूतावासों को सोमनाथ ट्रस्ट को किसी भी तरह की सहायता न देने के निर्देश दिए गए थे।
भाजपा के अनुसार, 13 जून 1951 को तत्कालीन उपराष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को लिखे पत्र में नेहरू ने सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन को ‘अनावश्यक शोर-शराबा’ बताया था। वहीं, 28 अप्रैल 1951 को सूचना एवं प्रसारण मंत्री आर.आर. दिवाकर को लिखे पत्र में मंदिर के अभिषेक समारोह की मीडिया कवरेज कम करने और इसे आडंबरपूर्ण करार देने की बात कही गई थी।
वहीं, कांग्रेस ने भाजपा के सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि पंडित नेहरू ने महात्मा गांधी और सरदार वल्लभभाई पटेल की सहमति से तय उस नीति का पालन किया था, जिसके तहत धार्मिक स्थलों के निर्माण में सरकारी धन का उपयोग नहीं किया जाना था। कांग्रेस का कहना है कि भाजपा नेहरू और सोमनाथ मंदिर को लेकर इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश कर रही है।
कांग्रेस ने पलटवार करते हुए यह भी सवाल उठाया कि यदि धार्मिक आयोजनों में संवैधानिक पदों की भूमिका पर भाजपा की यही सोच है, तो फिर राम मंदिर शिलान्यास और उद्घाटन में तत्कालीन और वर्तमान राष्ट्रपति को क्यों आमंत्रित नहीं किया गया।
सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण को लेकर यह सियासी बहस एक बार फिर इतिहास, आस्था और राजनीति के टकराव को केंद्र में ले आई है।




