छत्तीसगढ़ में लोकपर्व छेरछेरा पुन्नी का उत्सव, अन्नदान और सामाजिक समरसता का संदेश

रायपुर ( शिखर दर्शन ) // छत्तीसगढ़ में धान और अन्न के दान का सबसे बड़ा पर्व लोकपर्व छेरछेरा पुन्नी आज हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। इसे पौष पूर्णिमा और शांकभरी जयंती के नाम से भी जाना जाता है। छत्तीसगढ़ में छेरछेरा पुन्नी का विशेष सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व है।
साल की शुरुआत में मनाया जाने वाला यह पर्व केवल रुपए-पैसे के दान का नहीं बल्कि धान और फसल का दान करने की परंपरा का प्रतीक है। इस दिन समाज में उदारता, दानशीलता और सामाजिक समरसता के कई पहलु उजागर होते हैं।
🟦 🌟 अब आपकी आवाज़ बनेगी खबर — शिखर दर्शन न्यूज़ में रिपोर्टर बनने का मौका 🌟
📍 ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में संवाददाता / रिपोर्टर नियुक्त किए जा रहे हैं।
यदि आप—
✔ सच को सामने लाने का जज़्बा रखते हैं
✔ अपने इलाके की खबर देश तक पहुँचाना चाहते हैं
✔ पत्रकारिता में पहचान बनाना चाहते हैं
तो आज ही जुड़िए शिखर दर्शन न्यूज़ से 👇
📞 संपर्क करें : 9826412444
➡️ सीमित अवसर | गंभीर एवं इच्छुक व्यक्ति ही संपर्क करें
छेरछेरा पर्व का महत्व
- महादान और फसल उत्सव: यह पर्व किसानों में उदारता और समाज में सामाजिक समरसता का संदेश देता है।
- दान की परंपरा: बच्चे, युवा और महिलाएं गांव-खलिहानों में जाकर धान और भेंट स्वरूप पैसे इकट्ठा करते हैं। इकट्ठा किया गया धान और राशि वर्षभर के सामाजिक कार्यक्रमों में उपयोग होती है।
- आध्यात्मिक पहलू: यह पर्व बड़े-छोटे के भेदभाव और अहंकार को दूर करता है।
- सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व: पौष पूर्णिमा के दिन लोग मां शाकम्भरी की जयंती भी मनाते हैं। पौराणिक मान्यता है कि इस दिन भगवान शंकर ने माता अन्नपूर्णा से भिक्षा मांगी थी, इसलिए लोग धान, साग-भाजी और फल का दान करते हैं।
शाकम्भरी माता की जयंती
- शाकम्भरी माता देवी भगवती का अवतार मानी जाती हैं। उन्होंने पृथ्वी पर अकाल और खाद्य संकट कम करने के लिए यह रूप लिया।
- इन्हें सब्जियों, फलों और हरी पत्तियों की देवी के रूप में पूजा जाता है।
- पौष पूर्णिमा के दिन लोग पवित्र नदी में स्नान करते हैं, जिससे मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।




