राष्ट्रीय

“गुरु नानक जयंती” मानवता, समानता और सेवा का संदेश

“गुरुपर्व की शुभकामनाएँ”

विशेष रिपोर्ट
नई दिल्ली / रायपुर ( शिखर दर्शन ) // आज पूरा देश बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ गुरु नानक देव जी के 556वें प्रकाश पर्व यानी गुरुपर्व का आयोजन कर रहा है। कार्तिक पूर्णिमा के पावन अवसर पर मनाया गया यह पर्व न केवल सिख धर्म के अनुयायियों के लिए बल्कि समस्त मानवता के लिए ‘मानवता, समानता एवं निस्वार्थ सेवा’ का संदेश लेकर आता है।

  • वे 1469 में पंजाब (अब पाकिस्तान के ननकाना साहिब के पास) के गाँव तलवंडी में जन्मे थे।
  • उनका जीवन सामाजिक, धार्मिक तथा आध्यात्मिक बदलाव के लिए समर्पित रहा — जाति, धार्मिक विभाजन, भेदभाव और विधि‑विधानों के दिखावे को उन्होंने चुनौती दी।
  • प्रकाश पर्व उन शिक्षाओं का स्मरण है जिन्हें उन्होंने जीवन पर्यन्त आत्मसात् किया और सिखों तथा मानवता के समक्ष प्रस्तुत किया।

प्रकाश पर्व का महत्व

गुरु नानक देव जी का जन्म समय–स्थान, उस युग की पृष्ठभूमि तथा उनका संदेश इस प्रकार हैं:

गुरु नानक देव जी की मूल तीन शिक्षाएं

आपके द्वारा प्रस्तुत सामग्री के अनुसार गुरुजी ने तीन मूल सिद्धांत दिए — और व्याख्या निम्नानुसार है:

  1. नाम जपो (ईश्वर का स्मरण)
    सरल रूप में: सच्चे हृदय से ईश्वर का नाम जपना, हर क्षण उसे याद रखना।
    धर्म‑साहित्य में इसे “नाम जपो/नाम सिमरन” कहा गया है।
    उन्हें यह विश्वास था कि ईश्वर एक है (सिख धर्म में ‘ਇੱਕ ਓਅੰਕਾਰ’ / Ik Onkar) और उस ईश्वर का अनुभव प्रत्येक मनुष्य के भीतर संभव है।
  2. कीरत करो (ईमानदारी से काम)
    अर्थ‑गत: मेहनत और ईमानदारी से आजीविका कमाना, जीवन को संस्कारित करना।
    गुरुजी का मानना था कि आध्यात्मिक जीवन और सांसारिक जीवन को अलग नहीं करना चाहिए — घर‑परिवार, कर्म और सेवा के माध्यम से भी ईश्वर‑वाणी संभव है।
  3. वंड छको (बाँटकर खाओ)
    सरल अर्थ: अपनी कमाई, भोजन तथा संसाधन ज़रूरतमंदों के साथ बाँटना।
    यह सिर्फ दान‑धर्म नहीं बल्कि ‘समानता’, ‘भाईचारा’ एवं ‘सेवा’ की अनुभूति है।
    उदाहरण के रूप में, गुरुजी द्वारा प्रारंभ किया गया लंगर‑व्यवस्था इसी विचार का प्रत्यक्ष प्रसार था — सभी को एक ही जगह बैठकर भोजन, irrespective of जाति / धर्म, मिलना।

आज‑का संदर्भ: क्यों आज का पर्व हमारे लिए प्रासंगिक है

आज के दिन ये बातें विशेष रूप से ध्यान देने योग्य हैं:

  • आधुनिक जीवन‑व्यस्तता, प्रतिस्पर्धा और भौतिकतावाद के युग में गुरुजी की शिक्षा हमें याद दिलाती है कि सच्चा विकास केवल बाहरी समृद्धि में नहीं, बल्कि चरित्र‑विकास एवं दूसरों के लिए योगदान में है।
  • सामाजिक विभाजन, आर्थिक असमानता और मानवाधिकारों की चुनौतियों के बीच गुरुजी की समानता‑वाणी आज भी कितनी प्रवाहमान है, यह हमें आज के संदर्भ में स्पष्ट दिखता है।
  • “वंड छको” सिद्धांत के द्वारा, “खाना खिलाना या संसाधन बाँटना” जैसी क्रिया केवल स्वरूप नहीं, बल्कि मानव‑सेवा, करुणा और धरोहर‑भावना का प्रतीक है। इस दृष्टि से, आपकी उपरोक्त व्याख्या बिल्कुल सटीक है।

संपादकीय टिप्पणी: गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं का आज का संदेश

गुरु नानक देव जी की शिक्षाएँ सिर्फ सिखों के धर्म तक सीमित नहीं हैं; वे समस्त मानवता के लिए प्रेरणा‑स्त्रोत हैं। आइए‑देखें तीन आर‑विचार जो आज विशेष रूप से हमें संबोधित करते हैं:

1. सभ्यता‑बदलाव का मॉडल

गुरुजी ने उस काल‑परिस्थिति में जहाँ जात‑पात, धार्मिक विभाजन और सामाजिक असमानता आम थे, एक ऐसी सामाजिक दृष्टि प्रस्तुत की जिसमें “हिन्दू” और “मुसलमान” जैसा विभाजन अर्थहीन हो गया था। एक पद में उन्होंने कहा था:

“ There is no Hindu, there is no Muslim. ”
यह विचार आज के बहुधार्मिक, बहुसांस्कृतिक भारत में और अधिक अर्थ रखता है। अर्थ है: धर्म, जाति, लिंग या आर्थिक स्थिति से ऊपर — मानव की अंतर्निहित गरिमा है।

2. आध्यात्मिकता + सामाजिकता = पूर्ण जीवन

गुरुजी ने योग, तप या केवल मठ‑मस्ज़िद में जाकर ईश्वर खोजने की परंपरा को चुनौती दी। उन्होंने कहा कि ईश्वर हर व्यक्ति के भीतर है, और उसे याद रखना (नाम जपो), मेहनत से जीवन यापन करना (कीरत करो) तथा दूसरों के साथ बाँटना (वंड छको) ही सच्चा धर्म है।
इस दृष्टि से, उनके सिद्धांत “विचार को व्यवहार में बदलने” का आह्वान हैं। आज‑काल के भ्रष्टाचार, अकर्मण्यता और स्व‑केन्द्रित जीवन में उनकी यह सीख बहुत प्रासंगिक है।

3. समानता एवं सेवा‑भावना का सार्वभौमिक संदेश

गुरुजी ने लिंग‑भेद, जात‑भेद, श्रेणी‑भेद को खारिज किया और स्पष्ट रूप से महिलाओं के समान अधिकारों का समर्थन किया:

“ From woman, man is born; … So why call her bad ?”
आज जब वैश्विक स्तर पर — नारी‑सशक्तिकरण, मानवाधिकार, नागरिक समानता — पर बातें हो रही हैं, उस संदर्भ में गुरुजी की ओर से दिया गया यह संदेश हमें याद दिलाता है कि सच्ची समानता तब होती है जब उसे व्यवहार में उतारा जाए
सेवा‑भाव (Seva) और बाँटने का संस्कार (Vand Chhako) सिर्फ धार्मिक क्रिया नहीं बल्कि मानव‑समाज की जड़ें मजबूत करने वाला पहलू बन सकता है।

आज जब हम गुरु नानक देव जी के प्रकाश पर्व — उनकी 556वीं जयंती — मना रहे हैं, तो यह अवसर हमें प्रेरित करता है:

  • हर पल में ईश्वर‑स्मरण (नाम जपो) को जीवन‑चर्या में स्थान दें।
  • ईमानदारी, मेहनत और नैतिकता (कीरत करो) को अपने व्यवहार में अपनाएँ।
  • अपनी जो सामग्री, संसाधन या समय है, उसे जरूरतमंदों के साथ बाँटें, सेवा‑भाव से (वंड छको)।
    इन तीनों उपायों के माध्यम से हम न केवल व्यक्तिगत रूप से उन्नति कर सकते हैं बल्कि सामाजिक रूप से भी एक बेहतर, समतावादी और सहृदय समाज का निर्माण कर सकते हैं।

आज का यह पर्व हमें याद दिलाता है कि धर्म का वास्तविक अर्थ प्राप्ति नहीं, बल्कि उपहार देना है — अपने भीतर के ईश्वर‑बीज को जाग्रत करते हुए, दूसरों के कल्याण में समर्पित होकर।

गुरु नानक देव जी के आदर्श हमें प्रेरित करते रहें।
हर हर महादेव। ॐ नमः शिवाय। गुरुपर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ।

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