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अंतरराष्ट्रीय बेटी दिवस: बेटियां हैं समाज की असली धरोहर

कहा गया है कि बेटियां घर का आंगन नहीं, आकाश होती हैं, जिनकी चमक पूरे परिवार, समाज और राष्ट्र को आलोकित करती है। अंतरराष्ट्रीय बेटी दिवस पर हमें यह स्मरण करना चाहिए कि बेटी केवल माता-पिता की संतान भर नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और मूल्यों की जीवंत धरोहर है।

परिवार की धुरी और संस्कारों की संवाहक

बेटी जन्म लेते ही अपने परिवार में नई ऊर्जा और संवेदनशीलता लाती है। उसकी मासूम मुस्कान से घर में जीवन का रस बहने लगता है। बचपन में वह भाई-बहनों के बीच प्यार और जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाती है, तो बड़ी होकर परिवार की धुरी बन जाती है। संस्कार, संवेदना और सहानुभूति उसके सहज स्वभाव में समाहित रहते हैं।

दो परिवारों को जोड़ने का सेतु

शादी के बाद बेटी केवल जीवनसाथी ही नहीं पाती, बल्कि एक नए परिवार की जिम्मेदारी भी अपने कंधों पर लेती है। वह दोनों परिवारों के बीच संबंधों की डोर को मजबूत करती है। अपनी विनम्रता, स्नेह और समर्पण से बेटी दो घरों को एक सूत्र में पिरो देती है। यही कारण है कि बेटी को “घर की लक्ष्मी” कहा जाता है।

माता-पिता की इज्जत और वंश की वाहक

बेटी का आचरण और संस्कार माता-पिता की पहचान होते हैं। समाज में उसका व्यवहार ही परिवार की प्रतिष्ठा का परिचायक बनता है। संतानोत्पत्ति और वंश वृद्धि में उसकी भूमिका अपरिहार्य है। वह न केवल परिवार की परंपरा आगे बढ़ाती है, बल्कि नई पीढ़ी को आदर्श और मूल्य भी प्रदान करती है।

पति और ससुराल का मान-सम्मान

विवाह के बाद बेटी अपने पति और ससुराल की मर्यादा का भी संबल बनती है। उसकी समझदारी, त्याग और धैर्य ही पति-पत्नी के रिश्ते को संतुलित बनाए रखते हैं। वह सास-ससुर की सेवा और बच्चों के पालन-पोषण से घर को एक संपूर्ण परिवार में बदल देती है।

समाज और राष्ट्र की जरूरत

बेटियां केवल घर तक सीमित नहीं रहतीं। शिक्षा, राजनीति, विज्ञान, कला, खेल, उद्योग—हर क्षेत्र में वे अपनी प्रतिभा का परचम लहरा रही हैं। समाज में महिला सशक्तिकरण का अर्थ ही है बेटियों को समान अवसर और सम्मान देना। अगर बेटियों को सुरक्षित और सक्षम वातावरण मिले, तो कोई भी समाज पीछे नहीं रह सकता।

निष्कर्ष

बेटियां केवल बेटियां नहीं, जीवन की धड़कन हैं। वे माँ के आंसू पोछती हैं, पिता का अभिमान बढ़ाती हैं, भाई की प्रेरणा बनती हैं और अपने बच्चों की प्रथम गुरु होती हैं। इस अंतरराष्ट्रीय बेटी दिवस पर हमें संकल्प लेना चाहिए कि बेटियों को न केवल समान अधिकार और अवसर दें, बल्कि उन्हें वह सम्मान भी दें जिसकी वे सच्ची हकदार हैं।

👉 क्योंकि, जहां बेटियां मुस्कुराती हैं, वहीं सभ्यता खिलती है और भविष्य उज्ज्वल होता है।


लेखक: [ राजेश निर्मलकर , B.J.M.C. (Bachelor of Journalism
& Mass Communication), M.M.C.J. (Masters of Mass Communication &
Journalism), L.L.B. (Bachelor of Laws) , डायरेक्टर, शिखर दर्शन न्यूज ]

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