ज्योतिषी

बुद्ध पूर्णिमा: करुणा, शांति और आत्मबोध का वैश्विक उत्सव

संपादकीय विशेष :               बुद्ध पूर्णिमा न केवल बौद्ध अनुयायियों के लिए, बल्कि समस्त मानवता के लिए एक आत्मचिंतन और आध्यात्मिक उत्थान का पर्व है। यह दिन उस महामानव की स्मृति में मनाया जाता है, जिसने अपने अनुभव, ज्ञान और साधना से संपूर्ण जगत को दुख से मुक्ति का मार्ग दिखाया — वह हैं भगवान गौतम बुद्ध। बुद्ध पूर्णिमा वैशाख मास की पूर्णिमा तिथि को आती है, और इस दिन भगवान बुद्ध का जन्म, बोधि प्राप्ति और महापरिनिर्वाण, तीनों घटनाएं हुई थीं, इसलिए इसे त्रिविध पवित्र दिवस भी कहा जाता है।

बुद्ध पूर्णिमा क्यों मनाई जाती है ?

बुद्ध पूर्णिमा का मूल उद्देश्य है — भगवान बुद्ध के जीवन, शिक्षाओं और आत्मज्ञान की भावना को स्मरण करना और उन्हें आत्मसात करना। यह दिन करुणा, अहिंसा, संयम, और ध्यान के मूल सिद्धांतों का उत्सव है। इस दिन बौद्ध अनुयायी पूजा-अर्चना, ध्यान, व्रत और सत्संग के माध्यम से बुद्ध के मार्ग का अनुसरण करते हैं।

बुद्ध पूर्णिमा की ऐतिहासिक शुरुआत

बुद्ध पूर्णिमा को मनाने की परंपरा ईसा पूर्व तीसरी सदी में सम्राट अशोक महान के काल से संगठित रूप में आरंभ मानी जाती है। अशोक, जो युद्धों से क्षुब्ध होकर बौद्ध धर्म में दीक्षित हुए थे, उन्होंने इसे एक राजकीय पर्व का दर्जा दिया और इसे पूरे भारत और श्रीलंका सहित अन्य देशों में प्रचारित किया।

गौतम बुद्ध का जन्म और आध्यात्मिक पथ

भगवान बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व में लुंबिनी (वर्तमान नेपाल) में हुआ था। उनका मूल नाम था सिद्धार्थ गौतम, और वे शाक्य वंश के राजा शुद्धोधन और माता महामाया के पुत्र थे। बचपन से ही सिद्धार्थ में गंभीर चिंतनशीलता, करुणा और वैराग्य की भावना थी।

राजसी वैभव के बीच रहते हुए भी उन्होंने जीवन की वास्तविकता को समझने के लिए घर, परिवार और पुत्र राहुल को छोड़कर संन्यास ग्रहण किया। वर्षों की कठोर तपस्या के बाद उन्होंने बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त किया, और वे बुद्ध (जाग्रत) कहलाए। इसके बाद उन्होंने काशी के सारनाथ में पहला उपदेश दिया — जिसे धर्मचक्र प्रवर्तन कहा जाता है।

भगवान बुद्ध की शिक्षाएं और विश्व को उनका संदेश

बुद्ध का दर्शन न तो कर्मकांड पर आधारित था, न ही किसी रूढ़ि पर। उन्होंने चार आर्य सत्य और अष्टांगिक मार्ग के माध्यम से दुख से मुक्ति का मार्ग बताया:

दुख है।

दुख का कारण है (तृष्णा)।

दुख का निवारण संभव है।

दुख निवारण का मार्ग है — अष्टांगिक मार्ग (सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाक्, सम्यक कर्म, सम्यक आजीविका, सम्यक प्रयास, सम्यक स्मृति, सम्यक समाधि)।

बुद्ध का यह ज्ञान आज भी मनुष्य को आत्म-प्रकाश और शांति का मार्ग दिखाता है।


विश्व में बुद्ध पूर्णिमा का उत्सव

बुद्ध पूर्णिमा केवल भारत में नहीं, बल्कि नेपाल, श्रीलंका, भूटान, थाईलैंड, म्यांमार, कंबोडिया, लाओस, तिब्बत, जापान, चीन, दक्षिण कोरिया, मंगोलिया और वियतनाम जैसे अनेक देशों में बड़े श्रद्धा और भक्ति से मनाई जाती है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी इसे एक अंतरराष्ट्रीय धार्मिक पर्व के रूप में मान्यता दी है।

बौद्ध अनुयायियों की संख्या और भारत में प्रतिशत

विश्व में लगभग 53 करोड़ से अधिक बौद्ध अनुयायी हैं, जो इसे दुनिया का चौथा सबसे बड़ा धर्म बनाते हैं। इनमें से सर्वाधिक बौद्ध चीन, थाईलैंड, जापान, म्यांमार और श्रीलंका में हैं। भारत में लगभग 80 से 90 लाख बौद्ध हैं, जो जनसंख्या का लगभग 0.7 प्रतिशत हैं। हालांकि, भारत ही बौद्ध धर्म की जन्मभूमि है और यहां की धरती पर बुद्ध का संपूर्ण जीवन दर्शन विकसित हुआ।

धर्म की रक्षा के लिए विकसित की गई युद्धकला: शांति के भीतर शक्ति का संदेश

यद्यपि भगवान बुद्ध स्वयं अहिंसा के परम प्रतीक थे, किंतु उनकी शिक्षाओं को अपनाने वाले देशों ने धर्म की रक्षा हेतु आत्मरक्षा के रूप में युद्धकला को अपनाया। उदाहरणतः:

शौर्य और ध्यान का संगम: चीन और जापान में बौद्ध भिक्षुओं ने शाओलिन कुंगफू जैसे मार्शल आर्ट्स विकसित किए, जो बुद्ध के ध्यान और अनुशासन पर आधारित थे।

शाओलिन मंदिर, चीन में स्थापित हुआ था जहां बौद्ध भिक्षु आत्मरक्षा हेतु युद्धकला सीखते थे।

यह शैली शांति की रक्षा हेतु थी, न कि आक्रमण के लिए — बुद्ध का संदेश था ‘अहिंसा परमो धर्मः’, लेकिन धर्म की रक्षा के लिए आत्मबल जरूरी है।

बुद्ध पूर्णिमा का आध्यात्मिक महत्व

यह पर्व व्यक्ति को स्वयं की खोज, आत्म-प्रकाश, करुणा, मौन, और संतुलन का अभ्यास करने का अवसर देता है। यह हमें सिखाता है कि बाहर की लड़ाई से पहले हमें भीतर की अशांति को शांत करना चाहिए। ध्यान, संयम और संतुलन — ये ही हैं बुद्ध की मूल चेतना।

निष्कर्ष

बुद्ध पूर्णिमा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि यह आत्मा की यात्रा का उत्सव है। यह हमें सिखाता है कि जीवन का लक्ष्य केवल भोग नहीं, बल्कि बोध है। आज जब विश्व अशांति, संघर्ष और तनाव से ग्रस्त है, बुद्ध का मार्ग करुणा, ध्यान और सह-अस्तित्व का संदेश देता है — जो किसी भी युग में सबसे अधिक प्रासंगिक है।

✍️ लेखक: [ राजेश निर्मलकर , B.J.M.C. (Bachelor of Journalism & Mass Communication), M.M.C.J. (Masters of Mass Communication &
Journalism), L.L.B. (Bachelor of Laws) , डायरेक्टर, शिखर दर्शन न्यूज ]

—————————————————————————————————-
—————————————————————————————————-

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
Don`t copy text!