इफ्तार हो सकती है तो रामनवमी क्यों नहीं? जादवपुर यूनिवर्सिटी में ‘आजाद कश्मीर’ के नारों पर पद्मश्री काजी अख्तर ने जताई कड़ी आपत्ति

कोलकाता (शिखर दर्शन) // पश्चिम बंगाल के जादवपुर विश्वविद्यालय में जनरल स्टूडेंट्स यूनियन द्वारा आयोजित रामनवमी समारोह में शामिल होकर पद्मश्री सम्मानित शिक्षाविद् काजी मासूम अख्तर ने धर्मनिरपेक्षता, शिक्षा संस्थानों की भूमिका और राष्ट्रभक्ति पर खुलकर विचार रखे। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि विश्वविद्यालय में सरस्वती पूजा मनाई जा सकती है, तो फिर रामनवमी मनाने पर आपत्ति क्यों की जा रही है? उन्होंने इसे धर्मनिरपेक्षता की वास्तविक परिभाषा के खिलाफ बताया।
रामनवमी समारोह को संबोधित करते हुए काजी मासूम ने कहा, “हम यहां सरस्वती पूजा भी करते हैं, तो फिर रामनवमी को लेकर इतना विवाद क्यों? अगर किसी को इससे समस्या है तो कुछ शर्तें तय की जा सकती हैं, लेकिन त्योहार को पूरी तरह नकारना उचित नहीं है।”
उन्होंने विश्वविद्यालय परिसर में दीवारों पर लिखे गए ‘आजाद कश्मीर’ जैसे नारों पर भी नाराजगी जताई और कहा कि वे खुद अपने हाथों से ऐसे नारे मिटाएंगे। उन्होंने दृढ़ता से कहा, “मैं खुद विश्वविद्यालय की दीवारों से ‘आजाद कश्मीर’ जैसे नारे हटाऊंगा, चाहे इसके लिए मुझे कितने भी खतरे का सामना क्यों न करना पड़े। यह हमारे देश के खिलाफ सोच है, जिसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।”
पद्मश्री काजी मासूम अख्तर ने यह भी कहा कि आज कुछ लोगों को लगता है कि देश से नफरत करना ही आधुनिकता है, लेकिन यह सोच पूरी तरह से गलत और गुमराह करने वाली है। उन्होंने कहा, “जिस राष्ट्रगान के लिए हमारे पूर्वजों ने खून बहाया, उसे अपमानित करना हमारे मूल्यों और संविधान के खिलाफ है।”
इफ्तार पार्टी के आयोजन का उल्लेख करते हुए उन्होंने सवाल उठाया कि जब एक धर्म विशेष के पर्व मनाए जा सकते हैं, तो फिर करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़े रामनवमी जैसे त्योहार पर आपत्ति क्यों? उन्होंने इसे धार्मिक भेदभाव करार दिया।
कौन हैं काजी मासूम अख्तर?
काजी मासूम अख्तर पश्चिम बंगाल के प्रतिष्ठित शिक्षाविद हैं, जिन्हें वर्ष 2020 में साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया। वे लड़कियों की शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक समरसता के पक्षधर हैं। अपने साहसिक विचारों और राष्ट्रनिष्ठ सोच के लिए वे युवाओं के बीच एक प्रेरणास्रोत बन चुके हैं।
काजी मासूम को हाल ही में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल द्वारा विश्वविद्यालय में कुलपति चयन की जिम्मेदारी भी सौंपी गई है, जिससे यह स्पष्ट है कि उन्हें शासन और शिक्षा व्यवस्था दोनों में गहरी समझ और भरोसा प्राप्त है।
यह घटना न केवल विश्वविद्यालय परिसर की विचारधारा पर प्रश्न उठाती है, बल्कि यह भी बताती है कि किस तरह कुछ लोग धर्मनिरपेक्षता के नाम पर एकतरफा सोच को बढ़ावा देने की कोशिश करते हैं — वहीं काजी मासूम जैसे व्यक्तित्व समाज में संतुलन और समरसता की मिसाल कायम करते हैं।



