सबरीमाला विवाद: महिलाओं की एंट्री पर बैन को केंद्र का समर्थन, SC ने कहा– अंधविश्वास तय करने का अधिकार हमारे पास

धार्मिक स्वतंत्रता बनाम समानता पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई तेज, 9 जजों की संविधान पीठ कर रही विचार
नई दिल्ली ( शिखर दर्शन ) // केरल के सबरीमाला मंदिर में मासिक धर्म आयु की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को लेकर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए बैन का समर्थन किया है। केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि धर्मनिरपेक्ष अदालतों को धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
सुनवाई के दौरान तुषार मेहता ने दलील दी कि 2018 का फैसला इस धारणा पर आधारित था कि पुरुष श्रेष्ठ हैं और महिलाएं निम्न, जबकि कई धार्मिक परंपराओं में पुरुषों के प्रवेश पर भी प्रतिबंध होते हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि केरल के कोट्टनकुलंगरा श्री देवी मंदिर में चामयाविलक्कु उत्सव के दौरान पुरुष महिलाओं का वेश धारण कर पूजा करते हैं, जो सदियों पुरानी परंपरा है।
वहीं, सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी भी धार्मिक प्रथा को अंधविश्वास माना जाए या नहीं, यह तय करने का अधिकार अदालत के पास है। कोर्ट ने कहा कि वह संविधान के दायरे में रहकर यह तय करेगा कि कौन सी प्रथा मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है।
सुनवाई के दौरान यह भी बहस हुई कि यदि किसी प्रथा को अंधविश्वास माना जाता है, तो उसमें दखल देने का अधिकार न्यायपालिका के पास है या विधायिका के पास। केंद्र सरकार का कहना है कि यह काम संसद या राज्य विधानसभाओं का होना चाहिए।
गौरतलब है कि 2018 में सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की पीठ ने 4:1 के बहुमत से सबरीमाला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दे दी थी। इसके बाद इस फैसले के खिलाफ 50 से ज्यादा पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं।
फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ 7 अप्रैल से 22 अप्रैल तक इन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है, जिसमें धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और परंपराओं के दायरे को लेकर व्यापक बहस जारी है।



