तेल संकट से दुनिया बेहाल: कई देशों में ‘एनर्जी लॉकडाउन’ जैसे हालात, भारत के लिए भी बढ़ी चिंता

मिडिल ईस्ट तनाव का वैश्विक असर, स्कूल बंद, वर्क फ्रॉम होम लागू; कई देशों में ईंधन राशनिंग शुरू, आम जनजीवन पर बड़ा असर
नई दिल्ली // ( शिखर दर्शन ) //
मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य पर मंडराते संकट ने अब वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को गंभीर रूप से प्रभावित करना शुरू कर दिया है। हालात ऐसे बन गए हैं कि कई देशों में ‘एनर्जी लॉकडाउन’ जैसे प्रतिबंध लागू किए जा रहे हैं, जिससे आम जनजीवन पर सीधा असर पड़ रहा है।
फिलीपींस में राष्ट्रीय ऊर्जा आपातकाल घोषित कर दिया गया है, जबकि श्रीलंका में स्कूल, विश्वविद्यालय और सरकारी दफ्तरों में अवकाश घोषित कर ईंधन खपत को सीमित किया जा रहा है। वहां QR कोड आधारित “फ्यूल पास सिस्टम” फिर से लागू कर दिया गया है, ताकि तेल की नियंत्रित आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके।
वहीं वियतनाम, लाओस और म्यांमार जैसे देशों में वर्क फ्रॉम होम, ऑड-ईवन फॉर्मूला और पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा देकर ईंधन की बचत की कोशिश की जा रही है। कंबोडिया में स्थिति और गंभीर हो गई है, जहां एक-तिहाई पेट्रोल पंप बंद हो चुके हैं।
अफ्रीका और यूरोप के कई देशों में भी हालात बिगड़ते नजर आ रहे हैं। केन्या में ईंधन राशनिंग लागू कर दी गई है और चेतावनी दी गई है कि मौजूदा स्टॉक सीमित समय तक ही चल पाएगा। दक्षिण अफ्रीका के कई इलाकों में पेट्रोल पंप सूख चुके हैं, जबकि स्लोवाकिया में डीजल की खरीद पर कोटा तय कर दिया गया है।
मिस्र में ऊर्जा बचत के लिए मॉल, रेस्टोरेंट और सरकारी कार्यालयों के समय सीमित कर दिए गए हैं, वहीं न्यूजीलैंड “कार-लेस डे” नीति को फिर से लागू करने पर विचार कर रहा है। ऑस्ट्रेलिया में ईंधन की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुकी हैं और सैकड़ों पेट्रोल पंप बिना सप्लाई के बंद हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति केवल अस्थायी नहीं है, बल्कि अगर मिडिल ईस्ट में तनाव लंबा खिंचता है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसका गहरा असर पड़ सकता है। तेल आपूर्ति बाधित होने से महंगाई, ट्रांसपोर्ट और उद्योगों पर व्यापक प्रभाव पड़ने की आशंका है।
भारत के संदर्भ में देखें तो फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है, लेकिन देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में अगर वैश्विक संकट और गहराता है, तो भारत पर भी इसका अप्रत्यक्ष दबाव पड़ सकता है।
आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले समय में दुनिया को “ऊर्जा प्रबंधन” और “वैकल्पिक स्रोतों” पर तेजी से काम करना होगा। फिलहाल हालात यही संकेत दे रहे हैं कि यदि युद्ध और आपूर्ति संकट जारी रहा, तो कई और देशों में सख्त प्रतिबंध और ऊर्जा नियंत्रण के उपाय देखने को मिल सकते हैं।


