दिल्ली

अलगाववादी नेता आसिया अंद्राबी को उम्रकैद, दो सहयोगियों को 30-30 साल की सजा

भारत के खिलाफ साजिश और आतंकी गतिविधियों में संलिप्तता पर विशेष अदालत का फैसला, UAPA के तहत सुनाई गई सजा

नई दिल्ली // ( शिखर दर्शन ) //
दिल्ली की एक विशेष अदालत ने कश्मीरी अलगाववादी नेता आसिया अंद्राबी को भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने और आतंकी गतिविधियों में संलिप्तता के मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई है। वहीं उनकी दो सहयोगियों सोफी फहमीदा और नाहिदा नसरीन को 30-30 साल के कठोर कारावास की सजा दी गई है।

यह सजा गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत सुनाई गई है। इससे पहले 14 जनवरी को अदालत ने तीनों को प्रतिबंधित संगठन ‘दुख्तरान-ए-मिल्लत’ से जुड़ी गतिविधियों में दोषी ठहराया था। सजा का ऐलान 24 मार्च को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश चंदरजीत सिंह द्वारा किया गया।

अदालत ने अपने विस्तृत आदेश में कहा कि दोषियों ने अपने कृत्यों के प्रति कोई पश्चाताप नहीं दिखाया, बल्कि उन्होंने अपने कृत्यों पर गर्व जताया और भविष्य में भी ऐसे कार्य जारी रखने की बात कही। न्यायालय ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे मामलों में नरमी बरतना समाज के लिए गलत संदेश होगा और इससे देश की अखंडता को चुनौती देने वाले तत्वों के हौसले बढ़ सकते हैं।

अदालत ने इस मामले की तुलना 26/11 मुंबई हमले के दोषी अजमल कसाब से करते हुए कहा कि जिस प्रकार उसने भी अपने कृत्य पर कोई पछतावा नहीं दिखाया था, उसी तरह यहां भी दोषियों का रवैया गंभीर है।

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने अदालत से आसिया अंद्राबी के लिए उम्रकैद की सजा की मांग की थी। एजेंसी के अनुसार, आरोपी लंबे समय से भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल रही हैं और देश के खिलाफ साजिश रचती रही हैं।

दुख्तरान-ए-मिल्लत संगठन, जिसकी स्थापना आसिया अंद्राबी ने की थी, जम्मू-कश्मीर को भारत से अलग करने की मांग करता रहा है। केंद्र सरकार ने वर्ष 2018 में इस संगठन को प्रतिबंधित घोषित कर दिया था।

आसिया अंद्राबी को UAPA की विभिन्न धाराओं के तहत दोषी पाया गया, जिनमें साजिश रचने और आतंकी संगठन की सदस्यता से जुड़ी धाराएं शामिल हैं। इसके अलावा उन्हें भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत भी देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने और आपराधिक साजिश जैसे गंभीर अपराधों में दोषी ठहराया गया।

आसिया अंद्राबी का जन्म 1963 में हुआ था और उन्होंने श्रीनगर से स्नातक की पढ़ाई की थी। वर्ष 1985 में उन्होंने दुख्तरान-ए-मिल्लत संगठन की स्थापना की और इसके बाद से कई बार उन्हें हिरासत में लिया गया।

इस फैसले को देश की सुरक्षा और कानून व्यवस्था के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जो आतंक और अलगाववादी गतिविधियों के खिलाफ सख्त संदेश देता है।

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