छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का अहम फैसला: बिना पेनिट्रेशन के इजैक्युलेशन केवल रेप की कोशिश, असली रेप नहीं

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का अहम फैसला: बिना लिंग प्रवेश के स्खलन केवल बलात्कार की कोशिश, वास्तविक बलात्कार नहीं
बिलासपुर (शिखर दर्शन) // छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने 20 साल पुराने वासुदेव गोंड बनाम छत्तीसगढ़ राज्य मामले में अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बिना लिंग प्रवेश के स्खलन को बलात्कार नहीं माना जाएगा, बल्कि इसे बलात्कार की कोशिश माना जाएगा।
कोर्ट ने सात साल की सज़ा घटाकर तीन साल छह महीने की
जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की अदालत ने आरोपी की सात साल की जेल की सज़ा को घटाकर तीन साल छह महीने कर दिया। अदालत ने दोषी को आदेश दिया कि वह दो महीने के भीतर बाकी जेल की सज़ा काटने के लिए सरेंडर करे।
बलात्कार और पेनिट्रेशन पर कोर्ट की राय
कोर्ट ने कहा कि IPC की धारा 376 के तहत बलात्कार के लिए पेनिट्रेशन अनिवार्य है। विक्टिम के क्रॉस-एग्जामिनेशन में यह सामने आया कि आरोपी ने अपना प्राइवेट पार्ट विक्टिम के प्राइवेट पार्ट के ऊपर रखा, लेकिन पूरा प्रवेश नहीं किया। अदालत ने कहा, “पार्शियल पेनिट्रेशन और बिना स्खलन के यह केवल बलात्कार की कोशिश मानी जाती है। वास्तविक बलात्कार नहीं हुआ।”
मेडिकल रिपोर्ट से मिले सबूत
कोर्ट ने मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर बताया कि पीड़िता की हाइमन फटी नहीं थी और बलात्कार के कोई पक्के निशान नहीं थे। डॉक्टर ने माना कि पार्शियल पेनिट्रेशन हुआ हो सकता है। अदालत ने इसे बलात्कार की कोशिश साबित करने के लिए पर्याप्त माना।
दोषी की कार्यवाहियों को माना तैयारी का हिस्सा
अदालत ने कहा कि आरोपी ने विक्टिम को कमरे में ज़बरदस्ती ले जाकर दरवाजा बंद किया, दोनों को नग्न किया और पार्शियल पेनिट्रेशन किया। इसे अदालत ने बलात्कार की तैयारी और कोशिश माना।
जेल की अवधि और सेट-ऑफ
अदालत ने बताया कि आरोपी ने ट्रायल के दौरान 03.06.2004 से 06.04.2005 तक लगभग 10 महीने 4 दिन जेल में बिताए थे। बेल मिलने के बाद कुल जेल अवधि लगभग 1 साल 1 महीना 4 दिन हुई। आरोपी Cr.P.C. सेक्शन 428 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 468 के तहत सेट ऑफ पाने का हकदार है।
वकीलों की भूमिका
दोषी के पक्ष में एडवोकेट राहिल अरुण कोचर और लीकेश कुमार ने केस लड़ा, जबकि राज्य की ओर से एडवोकेट मनीष कश्यप पेश हुए।



