हाई कोर्ट का आदेश भी बेअसर ! 89 साल के बुजुर्ग को अपनी ही जमीन से बेदखल कर दर-दर भटकाया, भतीजे पर गंभीर आरोप

बिलासपुर ( शिखर दर्शन ) // यह सिर्फ एक पारिवारिक विवाद नहीं, बल्कि व्यवस्था और रिश्तों—दोनों के टूटने की दर्दनाक कहानी है। कोनी क्षेत्र के कश्यप विहार में रहने वाले 89 वर्षीय सुरेश प्रसाद तिवारी और उनकी 80 वर्षीय पत्नी लता तिवारी आज अपने ही घर से बेदखल होकर किराए के मकान में जिंदगी काटने को मजबूर हैं। विडंबना यह है कि हाई कोर्ट तक से आदेश उनके पक्ष में आने के बावजूद उन्हें अब तक अपनी संपत्ति का वास्तविक कब्जा नहीं मिल सका है।
सेवा की उम्मीद में की गिफ्ट डीड, मिला अपमान और बेदखली
वर्ष 2016 में दंपती ने अपने भतीजे रामकृष्ण पांडे के नाम 1250 वर्गफीट जमीन और उस पर बने मकान की गिफ्ट डीड कर दी थी। उनकी कोई संतान नहीं है। उम्र के अंतिम पड़ाव पर उन्होंने यह सोचकर संपत्ति सौंप दी कि भतीजा जीवनभर उनका सहारा बनेगा।
लेकिन दंपती का आरोप है कि संपत्ति हाथ में आते ही रिश्तों का रंग बदल गया। भतीजे और उसकी बेटी का व्यवहार अचानक कठोर हो गया। उन्हें जबरन मकान की पहली मंजिल पर रहने को मजबूर किया गया, जबकि इस उम्र में सीढ़ियां चढ़ना-उतरना उनके लिए जानलेवा जोखिम से कम नहीं था।
बिजली-पानी तक काटा, भोजन में भी की कटौती
दंपती का कहना है कि उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया। खाने-पीने जैसी बुनियादी जरूरतों में कटौती की गई। इतना ही नहीं, बिजली और पानी का कनेक्शन तक काट दिया गया। हालात इतने असहनीय हो गए कि अंततः उन्हें अपना ही घर छोड़ना पड़ा। पिछले तीन वर्षों से वे किराए के मकान में जीवन बिता रहे हैं।
प्रशासन से लेकर हाई कोर्ट तक मिली राहत, लेकिन कब्जा अब भी दूर
मामला पहले एसडीओ और कलेक्टर के पास पहुंचा, जहां जांच के बाद फैसला दंपती के पक्ष में आया। इस आदेश को चुनौती देते हुए मामला हाई कोर्ट तक गया, लेकिन वहां भी निर्णय बुजुर्ग दंपती के हक में रहा।
इसके बावजूद जमीन पर स्थिति जस की तस है। तहसीलदार ने बताया कि बेदखली की कार्रवाई के लिए 2 फरवरी को टीम मौके पर पहुंची, लेकिन मकान पर ताला लगा मिला। 4 फरवरी को दोबारा प्रयास हुआ, पर पर्याप्त पुलिस बल नहीं मिलने से कार्रवाई टल गई। प्रशासन अब कोनी थाना प्रभारी से चर्चा कर शीघ्र कार्रवाई का आश्वासन दे रहा है।
गिरकर टूटी हड्डी, पर नहीं टूटी न्याय की उम्मीद
इधर, हाल ही में लता तिवारी गिर गईं, जिससे उनके पैर की हड्डी टूट गई। उम्र, बीमारी और बेघर होने की पीड़ा के बीच भी दंपती न्याय की आस लगाए बैठे हैं। उनका कहना है कि “हमने अपने ही खून पर भरोसा किया, बदले में बेघर कर दिया गया।”
सवालों के घेरे में अमलदारी
यह मामला कई सवाल खड़े करता है—
- जब हाई कोर्ट का स्पष्ट आदेश है, तो अमल में देरी क्यों ?
- बुजुर्ग दंपती को न्याय दिलाने में प्रशासन असहाय क्यों दिख रहा है ?
- क्या कानून की ताकत सिर्फ कागजों तक सीमित है ?
रिश्तों की आड़ में विश्वासघात और अदालत के आदेश के बाद भी कब्जा न मिलना—यह कहानी सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि उस सामाजिक सच्चाई की है जहां बुजुर्ग अक्सर संपत्ति के बाद ‘बोझ’ मान लिए जाते हैं।



