SIR पर SC में सुनवाई: याचिकाकर्ताओं का आरोप—ECI मनमानी नहीं कर सकता, अनपढ़ और प्रवासी मतदाताओं के लिए फॉर्म भरना मुश्किल; जानिए चुनाव आयोग का जवाब

SIR पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: चुनाव आयोग को मनमानी की इजाजत नहीं, नाम काटने पर पारदर्शिता जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर गुरुवार को सुनवाई की। सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग (ECI) ने अदालत को बताया कि SIR प्रक्रिया में सभी राज्यों को नियमों का सख्ती से पालन करना होगा। आयोग ने कहा कि तमिलनाडु में जिन मतदाताओं के नाम स्पेलिंग एरर के कारण हटाए गए हैं, उनकी सूची ग्राम पंचायत भवन, सब-डिवीजन के तालुका कार्यालय और शहरी क्षेत्रों के वार्ड कार्यालयों में सार्वजनिक रूप से चस्पा की जाए।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि चुनाव आयोग मनमानी नहीं कर सकता। उन्होंने सवाल उठाया कि चुनाव अधिकारी यह कैसे तय कर सकता है कि कोई व्यक्ति नागरिक है या नहीं, जबकि वे कोई अदालत नहीं हैं। यदि किसी नाम को लेकर विवाद है तो संबंधित व्यक्ति को सुनवाई और जिरह का पूरा मौका मिलना चाहिए।
प्रशांत भूषण ने यह भी आरोप लगाया कि नई वोटर लिस्ट तैयार करने की प्रक्रिया में बड़ी संख्या में महिलाओं के नाम काटे जा रहे हैं, जो पहले कभी नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया का बोझ गरीब, कमजोर, अनपढ़ और प्रवासी मतदाताओं पर डाला जा रहा है, क्योंकि उनसे खुद फॉर्म भरने की अपेक्षा की जा रही है, जबकि कई लोग ऐसा करने में असमर्थ हैं।
बिहार मामले में एक दिन पहले हुई थी अहम सुनवाई
इससे पहले बुधवार को बिहार में SIR को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि मतदाता सूची में नाम जोड़ना या हटाना पुनरीक्षण प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन यह पूरी तरह कानून और नियमों के दायरे में होना चाहिए।
कोर्ट ने आधार कार्ड की स्वीकार्यता को लेकर भी स्पष्ट रुख अपनाया। पीठ ने कहा कि केवल धोखाधड़ी की संभावना के आधार पर 12 अंकों वाले आधार कार्ड को खारिज नहीं किया जा सकता। यदि कोई दस्तावेज कानून द्वारा मान्यता प्राप्त है, तो उसे सिर्फ इस वजह से नकारा नहीं जा सकता कि उसके जारी होने में किसी निजी इकाई की भूमिका रही हो।
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने आरोप लगाया कि बिहार विधानसभा चुनाव से पहले बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। इस पर कोर्ट ने संकेत दिया कि चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा सर्वोपरि है।
कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट ने SIR प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग को स्पष्ट संदेश दिया है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण नियमों, पारदर्शिता और नागरिकों के अधिकारों का सम्मान करते हुए ही किया जाना चाहिए।



