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गुलाबी रात और काली हकीकत: छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक संवेदनशीलता की शर्मनाक सच्चाई पर सवाल

“राजेश निर्मलकर”

देशभक्ति और जश्न का प्रतीक हमारे सिनेमा में अक्सर हमें प्रेरणा देता है। मनोज कुमार की फिल्म “उपकार” का वह सीन, जिसमें गुलाबी रात की चमक-धमक के बीच दो गरीब बच्चों की दुखद कहानी दिखाई जाती है, आज छत्तीसगढ़ की हाल की घटनाओं की याद दिलाता है। जैसे फिल्मों में गुलाबी रात के साये में काली वास्तविकताएँ सामने आती हैं, वैसे ही आज सुदूर छत्तीसगढ़ के इलाकों में जश्न और दर्द, दिखावा और वास्तविकता का विचित्र मिश्रण नजर आ रहा है।

हाल के दिनों में लगातार सामने आ रही खबरें इस “गुलाबी रात” की झलक देती हैं। गरियाबंद, सूरजपुर, बैकुंठपुर-कोरिया और सोनहत ब्लॉक जैसे इलाके सामने आए हैं, जहां सरकारी लोगों और अधिकारियों की अश्लील डांस पार्टियों और खुलेआम नोट उड़ाने की घटनाएँ सोशल मीडिया पर वायरल हुई हैं। इन घटनाओं में उच्च स्तर के प्रशासनिक अधिकारी भी शामिल पाए गए, जिन पर कार्रवाई हुई, लेकिन सवाल यही है कि ये लोग इस हद तक हावी कैसे हो जाते हैं और सिस्टम की जिम्मेदारियों को दरकिनार कर अपनी मनमानी कर रहे हैं ?

साथ ही, छत्तीसगढ़ के सुदूर जंगलों और आदिवासी इलाकों में आम लोग अपने जंगल, खनिज और पर्यावरण को बचाने के लिए सड़क पर उतर रहे हैं। हसदेव, अमेरा, तमनार और छुई खदान जैसे इलाकों में लोग लगातार विरोध कर रहे हैं। उनके संघर्ष की तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं। यह विरोध प्रशासन की उपेक्षा, सरकारी संवेदनशीलता की कमी और जनभावनाओं के प्रति जवाबदेही की कमी को उजागर करता है।

एक ओर प्रशासनिक गलियारों में “गुलाबी रात” की चमक-धमक है, शराब और शबाब के नशे में डूबे लोग नोट उड़ाते नजर आते हैं; दूसरी ओर उसी राज्य में आम लोग “काली रात” की सच्चाई—जंगलों और खनिज संसाधनों की तबाही, पर्यावरणीय संकट और सामाजिक अन्याय—का सामना कर रहे हैं। यह विरोधाभास बताता है कि शासन और सुशासन की परिभाषा अब केवल दफ्तरों तक सीमित रह गई है।

सिनेमा का वह मर्मस्पर्शी सीन हमें आज छत्तीसगढ़ की वास्तविकता की याद दिलाता है। जैसे गुलाबी रात के साये तले बच्चों की रात काली और दर्दभरी थी, वैसे ही आज राज्य में कुछ लोग जश्न और अपने स्वार्थ में मस्त हैं, जबकि वास्तविकता में आम जनता की पीड़ा, संघर्ष और सवाल अनसुने रह जाते हैं।

सवाल यही है कि क्या इस “गुलाबी रात” का सिलसिला रोकने की कोई प्रशासनिक संवेदनशीलता बची है? क्या सरकारी सिस्टम के जिम्मेदार अपनी जिम्मेदारी को समझेंगे और उन लोगों की पीड़ा को महसूस करेंगे जो जंगल, खनिज और पर्यावरण को बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं? या फिर गुलाबी रात की चमक और लालच के बीच जनता की “काली रात” और अधिक गहरी होती जाएगी ?

यह वक्त है छत्तीसगढ़ के प्रशासन और नेताओं के लिए कि वे केवल बाहरी चमक-धमक में न खोएँ, बल्कि वास्तविकता को देखेँ, जनता की आवाज़ सुनें और सुशासन की राह पर कदम बढ़ाएँ। वरना गुलाबी रात और काली हकीकत का यह विरोधाभास लंबे समय तक राज्य के लिए शर्मनाक याद बनकर रह जाएगा।


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