दिल्ली

राष्ट्रपति की शाही बग्घी: शान और परंपरा के साथ बंटवारे की अनसुनी कहानी

राष्ट्रपति की शाही बग्घी: गणतंत्र दिवस की ऐतिहासिक और धरोहर वाली झलक

नई दिल्ली (शिखर दर्शन) // हर साल गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रपति की सवारी देश की सबसे खास झलकियों में गिनी जाती है। इस बार भी राष्ट्रपति ने जब यूरोपीय संघ के शीर्ष नेताओं के साथ शाही बग्घी में कर्तव्य पथ पर प्रवेश किया, तो लोगों की नजरें बग्घी पर टिक गईं। यह बग्घी सिर्फ शान और परंपरा का प्रतीक नहीं है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र और स्वतंत्रता के इतिहास में एक अनोखी कहानी भी समेटे हुए है।

इतिहास में टॉस ने तय किया भाग्य
यह शाही बग्घी अंग्रेजी दौर की विरासत है और कभी वायसराय इसी बग्घी में सवार होकर सरकारी कार्यक्रमों में पहुंचते थे। 1947 में भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के दौरान इस बग्घी पर भी दोनों देशों ने दावा ठोका। विवाद इतना बढ़ा कि इसका समाधान टॉस के जरिए किया गया। भारत की ओर से लेफ्टिनेंट कर्नल ठाकुर गोविंद सिंह और पाकिस्तान की ओर साहबजादे याकूब खान मैदान में उतरे। सिक्का उछला और किस्मत भारत के पक्ष में गई। यही कारण है कि आज यह बग्घी भारत में सुरक्षित है।

गणतंत्र दिवस की विशेष पहचान
26 जनवरी 1950 को जब भारत ने अपना पहला गणतंत्र दिवस मनाया, देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद इसी शाही बग्घी में सवार होकर परेड स्थल पहुंचे थे। तब से यह बग्घी राष्ट्रपति की गरिमा, परंपरा और निरंतरता की प्रतीक बन गई है। इसकी भव्यता और ऐतिहासिक महत्व इसे हर गणतंत्र दिवस पर अनोखा आकर्षण बनाते हैं।

विशेषताएँ और परंपरा
बग्घी पर सोने की परत चढ़ी हुई है और दोनों ओर भारत का राष्ट्रीय चिन्ह सोने से जड़ा हुआ है। इसे खींचने वाले घोड़े खास तौर पर चुने जाते हैं। पहले यह छह ऑस्ट्रेलियाई घोड़ों द्वारा खींची जाती थी, लेकिन अब परंपरा के अनुसा

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
Don`t copy text!