25 वर्षों की मेहनत से संरक्षित धान की विरासत: ‘धरोहर समिति’ ने बचाईं 290 विलुप्त होती देसी किस्में

कोंडागांव (शिखर दर्शन) // – छत्तीसगढ़ को ‘धान का कटोरा’ कहा जाता है, लेकिन बस्तर जैसे आदिवासी क्षेत्रों में हाईब्रिड खेती के बढ़ते चलन के कारण पारंपरिक देसी धान की कई किस्में विलुप्ति के कगार पर पहुंच गई हैं। ऐसे समय में कोंडागांव के किसान शिवनाथ यादव और उनकी ‘धरोहर समिति’ ने इस विरासत को बचाने की मिसाल पेश की है।
करीब 25 वर्षों की मेहनत के बाद शिवनाथ यादव ने 290 देसी व विलुप्त होती धान की किस्मों को संरक्षित किया है, जबकि 44 किस्मों पर शोध अभी भी जारी है।
एक मकसद, एक आंदोलन
धरोहर समिति का मुख्य उद्देश्य है विलुप्त होती देसी धान की किस्मों को बचाना और किसानों को रासायनिक खेती छोड़कर पारंपरिक कृषि की ओर प्रेरित करना। समिति के प्रयास से मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और पर्यावरण संरक्षण को भी बल मिलता है। बीज संग्रहण के साथ-साथ यह काम पारंपरिक ज्ञान, किसानों के अधिकार और जैव विविधता के संरक्षण का व्यापक आंदोलन बन गया है।
प्रेरणा से शुरुआत
शिवनाथ यादव को देसी बीजों के संरक्षण की प्रेरणा मुंबई की स्वयंसेवी संस्था ‘रूरल कम्यूनस’ के संस्थापक स्व. मुन्नीर से मिली। वर्ष 1995 में उन्होंने कोंडागांव के गोलावंड में किसानों का समूह बनाकर ‘धरोहर समिति’ की स्थापना की। तब से यह समिति देसी बीजों के संरक्षण और संवर्धन में जुटी हुई है।
राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान
धरोहर समिति के उल्लेखनीय कार्य को राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली। कृषि मंत्रालय, नई दिल्ली द्वारा वर्ष 2016 में समिति को प्रशस्ति पत्र के साथ 10 लाख रुपये की प्रोत्साहन राशि प्रदान की गई।
बीज बेचने नहीं, बांटने का नियम
समिति बीजों का व्यापार नहीं करती। शिवनाथ यादव और उनका समूह बीजों की अदला-बदली करते हैं और किसानों को स्वयं बीज उत्पादन के लिए प्रेरित करते हैं। पारंपरिक ज्ञान और कृषि वैज्ञानिकों के सहयोग से देसी किस्मों का संरक्षण किया जा रहा है।
रासायनिक खेती पर चिंता
शिवनाथ यादव कहते हैं,
“पहले किसान जमीन की प्रकृति के अनुसार अलग-अलग किस्म का धान बोते थे और गोबर की खाद व प्राकृतिक तरीकों से कीट नियंत्रण होता था। आज अधिक उत्पादन की होड़ में रासायनिक खाद और दवाओं का अत्यधिक उपयोग हो रहा है, जिसका असर पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर पड़ रहा है।”
पोषण और औषधि से भरपूर
देसी धान की कई किस्में पोषक तत्वों और औषधीय गुणों से भरपूर हैं।
- काटा मैहर धान में प्राकृतिक रूप से आयरन पाया जाता है।
- इलायची आलचा जैसी किस्में औषधि के रूप में उपयोग की जाती रही हैं।
सुगंधित और विशेष किस्में
- पतला श्रेणी: बादशाहभोग, लोकटी माछी
- मोटा श्रेणी: दांदर, कुमड़ा फूल, कुकड़ी मुंही, अलसागार, बासमुही
- अर्ली वैरायटी: भूरसी, लालू-14, धंगढ़ी काजर
जैविक खेती की नई संभावनाएं
देश-विदेश में ब्लैक राइस, रेड राइस और पोषक तत्वों से भरपूर देसी चावल की मांग बढ़ रही है। इससे बस्तर अंचल में जैविक खेती और किसानों की आय बढ़ाने की नई संभावनाएं बन रही हैं। शिवनाथ यादव का मानना है कि देसी बीजों को संरक्षित कर बाजार से जोड़ा जाए तो यह क्षेत्र आत्मनिर्भर कृषि की मिसाल बन सकता है।
विरासत को बचाने की जंग
धरोहर समिति का प्रयास सिर्फ खेती तक सीमित नहीं है। यह भविष्य की पीढ़ियों के लिए खाद्य सुरक्षा और जैव विविधता को बचाने की लड़ाई है। शिवनाथ यादव जैसे किसानों की मेहनत यह साबित करती है कि मजबूत संकल्प के साथ विलुप्त होती विरासत को फिर से जीवन दिया जा सकता है।




