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बसंत पंचमी पर पीले रंग का विशेष महत्व, जानिए केसरिया भात और खिचड़ी का महत्व

उज्जैन (शिखर दर्शन) // बसंत पंचमी सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि वसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक भी है। इस दिन ज्ञान और बुद्धि की देवी मां सरस्वती की विशेष पूजा की जाती है। यह त्योहार प्रकृति के रंगों से भी जुड़ा है, और खासकर पीला रंग हर जगह दिखाई देता है—चाहे वह कपड़े हों, फूल हों या भोजन।

पीला रंग: उत्साह, ऊर्जा और ज्ञान का प्रतीक
वसंत ऋतु को ऋतुओं का राजा कहा जाता है। इस समय सरसों के खेत लहलहाते हैं और पलाश व टेसू के फूल खिलते हैं, जिससे प्रकृति पीले रंग में रंग जाती है। पीला रंग उत्साह, ऊर्जा और सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है और इसे ज्ञान तथा बुद्धि से जोड़ा जाता है। मां सरस्वती का प्रिय रंग भी यही पीला है, इसलिए बसंत पंचमी पर पीले वस्त्र, फूल और भोजन का विशेष महत्व होता है।

केसरिया भात: शुद्धता और शुभता का प्रतीक
इस दिन केसर या हल्दी से बना केसरिया भात मां सरस्वती को भोग के रूप में अर्पित किया जाता है। आयुर्वेद में केसर को सात्विक और तेज बढ़ाने वाला माना गया है। यह भात ज्ञान, स्मरण शक्ति और विवेक में वृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

पीली खिचड़ी: स्वास्थ्य और धार्मिक महत्व
बसंत पंचमी पर बनाई जाने वाली पीली खिचड़ी दाल और चावल का संतुलित मिश्रण होती है। यह ऋतु परिवर्तन के समय पाचन तंत्र को मजबूत रखती है और हल्दी के कारण इसमें रोग प्रतिरोधक गुण भी होते हैं। धार्मिक दृष्टि से खिचड़ी सरलता, सात्विकता और समर्पण का प्रतीक मानी जाती है।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
वसंत ऋतु में शरीर में कफ दोष बढ़ने लगता है। ऐसे में पीले रंग के हल्के और गर्म तासीर वाले भोजन कफ को संतुलित करते हैं, शरीर में नई ऊर्जा का संचार करते हैं और आलस्य को दूर करते हैं।

बसंत पंचमी पर पीले रंग के कपड़े पहनना और पीले भोजन का सेवन करना केवल परंपरा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और आध्यात्मिक लाभ का भी माध्यम है।

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