सुप्रीम कोर्ट ने मृत्युदंड के विकल्पों पर फैसला सुरक्षित रखा, केंद्र से मांगा दूसरा प्रभावी तरीका

सुप्रीम कोर्ट में फांसी के विकल्प पर बहस: मृत्युदंड पर उठा नैतिक सवाल ? ?
नई दिल्ली (शिखर दर्शन) // देश की सबसे बड़ी अदालत ने आज गुरुवार को उन याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया, जिनमें मौत की सजा पाए दोषियों को वैकल्पिक तरीके से सजा देने की मांग की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिकाओं में तर्क दिया गया कि फांसी के जरिए मौत दिलाना अत्यंत दर्दनाक और क्रूर तरीका है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने याचिकाकर्ताओं के वकीलों और केंद्र सरकार की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल को तीन हफ्ते के भीतर लिखित दलीलें दाखिल करने का निर्देश दिया।
केंद्र सरकार की रिपोर्ट में कहा गया कि मृत्युदंड देने का सबसे प्रभावी तरीका फांसी ही है। अदालत ने याचिकाकर्ताओं से पूछा कि अगर फांसी बेहतर विधि नहीं है, तो फिर कौन सा विकल्प अपनाया जा सकता है।
सुनवाई के दौरान एडवोकेट ऋषि मल्होत्रा ने कानून आयोग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि फांसी के अलावा भी कुछ विकल्प मौजूद हैं। वहीं, सीनियर एडवोकेट मीनाक्षी अरोड़ा ने प्रोजेक्ट 39A की रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए कहा कि जानलेवा इंजेक्शन जैसे विकल्प अमेरिका में अपनाए गए हैं, लेकिन उनका अनुभव पूरी तरह सफल नहीं रहा। उन्होंने सुझाव दिया कि विकल्पों की प्रभावशीलता जांचने के लिए एक विशेषज्ञ कमेटी बनाई जा सकती है।
जस्टिस नाथ ने कहा कि फांसी में दोषी तुरंत नहीं मरता और इसमें दर्द और तकलीफ का पहलू भी शामिल है।
भारत में मृत्युदंड पर चल रही बहस अब केवल कानून का मामला नहीं रह गई है, बल्कि यह लोकतांत्रिक संवेदनशीलता और राज्य के नैतिक अधिकारों की परीक्षा भी बन गई है। यह याचिका केवल मृत्युदंड की पद्धति पर सवाल नहीं उठाती, बल्कि यह भी जांचती है कि क्या राज्य को किसी व्यक्ति का जीवन छीनने का अधिकार होना चाहिए।




