सोमनाथ: 1000 साल पहले ध्वस्त, बार-बार लूटा गया और आज भव्य स्वरूप में पुनर्निर्मित , हजारों सालों की पीड़ा और पुनर्निर्माण की गाथा

अरब सागर किनारे खड़ा वह मंदिर, जिसे 17 बार लूटा और तोड़ा गया, आज अपनी भव्यता और दिव्यता के साथ खड़ा है सीना ताने

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर भारत के धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व का प्रतीक है। यह मंदिर न केवल भगवान शिव की उपासना का प्रमुख केंद्र है, बल्कि इसका इतिहास भी संघर्ष और पुनर्निर्माण की कहानी बताता है।

इतिहास और विनाश:
सोमनाथ मंदिर को पहली बार मुस्लिम आक्रांताओं ने लगभग 1000 साल पहले ध्वस्त किया था। इसके बाद इसे कई बार लूटा और तोड़ा गया। महमूद गजनवी ने मंदिर के चंदन द्वार लूटकर अफगानिस्तान के गजनी में मस्जिद में स्थापित कर दिए। स्वतंत्र भारत में वर्ष 1951 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के प्रयास से द्वार वापस लाकर मंदिर में स्थापित किए गए।

पुनर्निर्माण और वास्तुकला:
मंदिर का पुनर्निर्माण चालुक्य शैली में पीले बलुआ पत्थर से किया गया। इसका शिखर लगभग 155 फीट ऊंचा है, जिसमें सोने का कलश और विशाल मंडपम इसकी भव्यता बढ़ाते हैं।

धार्मिक मान्यताएं:
शास्त्रों में 12 ज्योतिर्लिंगों का उल्लेख है, और सोमनाथ को भगवान शिव का पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, चंद्रदेव ने मंदिर की स्थापना की और शिव की कठोर तपस्या कर आंशिक मुक्ति पाई। इसलिए यह मंदिर चंद्र से जुड़ा एकमात्र शिव तीर्थ भी माना जाता है।
विशेषताएं:
- मंदिर परिसर में दिशासूचक स्तंभ ‘बाणस्तंभ’ मौजूद है, जो समुद्र की दिशा में बना है।
- सोमनाथ से दक्षिण दिशा में लगभग 6000 किमी तक कोई भूमि नहीं है।
- अरब सागर के किनारे होने के बावजूद लहरें गर्भगृह तक कभी नहीं पहुँचतीं, जिसे शिव की कृपा माना जाता है।

धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व:
सोमनाथ मंदिर न केवल धार्मिक श्रद्धा का केंद्र है, बल्कि यह भारतीय इतिहास में असंख्य हमलों और पुनर्निर्माण की कहानी भी बयां करता है। हर बार ध्वस्त होने के बाद भी यह मंदिर अपनी भव्यता और दिव्यता के साथ खड़ा रहा।



