हिंदी दिवस: भाषा नहीं, भारतीय आत्मा की अभिव्यक्ति

हिंदी क्या है और क्यों बनी अभिव्यक्ति का माध्यम
हिंदी केवल एक भाषा नहीं है, बल्कि भारतीय समाज की आत्मा और संस्कृति की जीवंत अभिव्यक्ति है। यह वह माध्यम है, जिसने आमजन को जोड़ने, विचार व्यक्त करने और संस्कृति को संरक्षित करने का काम किया। सरल शब्दों, लयात्मकता और आत्मीयता के कारण यह भाषा हर वर्ग और हर पीढ़ी की अभिव्यक्ति बन सकी।
हिंदी की उत्पत्ति और ऐतिहासिक विकास
हिंदी की जड़ें संस्कृत में हैं। प्राकृत और अपभ्रंश से गुजरते हुए यह भाषा मध्यकाल में ‘हिंदवी’ या ‘खड़ी बोली’ के रूप में आकार लेने लगी।
वैदिक काल (ऋग्वैदिक युग) : संस्कृत का प्रभुत्व रहा, जिसे भारतीय भाषाओं की जननी माना जाता है।
मध्यकाल : प्राकृत और अपभ्रंश के रूप में भाषा आम बोलचाल में ढलने लगी।
भक्ति युग : तुलसीदास, कबीर, सूरदास और मीरा जैसे संतों ने हिंदी को जन-जन तक पहुँचाया।
आधुनिक काल : भारतेन्दु हरिश्चंद्र और महावीर प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी को साहित्य और पत्रकारिता में स्थापित किया।
आज यह भाषा तकनीक, शिक्षा और प्रशासन तक फैल चुकी है।
किसने सबसे पहले अपनाई हिंदी
उत्तर भारत के गाँवों और नगरों के आम लोग सबसे पहले इस भाषा से जुड़े। उसके बाद कवियों और संतों ने इसे लोकभाषा का दर्जा दिलाया।

संस्कृत से निकली भाषाओं में हिंदी सबसे अधिक लचीली और सर्वग्राही सिद्ध हुई। इसके बाद राजस्थानी, भोजपुरी, अवधी, मगही, ब्रज, हरियाणवी जैसी बोलियों ने जन्म लिया।
बोलियाँ और भाषा का अंतर
भाषा एक व्यापक प्रणाली है, जबकि बोली उसका क्षेत्रीय रूप। हिंदी के अंतर्गत लगभग 50 से अधिक बोलियाँ आती हैं।
भारतीय परंपरा कहती है – “कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर बानी।” यानी कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर हिंदी की ध्वनि, लय और उच्चारण बदल जाता है।
दुनिया में हिंदी का प्रभाव
आज हिंदी भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में बोली और समझी जाती है।
दुबई, अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप : प्रवासी भारतीयों के कारण हिंदी यहाँ तेजी से फैल रही है।
श्रीलंका, पाकिस्तान, बांग्लादेश, मालदीव, नेपाल : यहाँ हिंदी समझी और अपनाई जाती है।
चीन और जापान : शैक्षिक संस्थानों में हिंदी का अध्ययन बढ़ रहा है।
आज संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने की कोशिशें जारी हैं।
भारत में हिंदी और क्षेत्रीय भाषाएँ
भारत बहुभाषी देश है। बंगला, तेलुगु, मराठी, कन्नड़, मलयालम जैसी भाषाएँ अपनी-अपनी धरोहर हैं। लेकिन कई बार क्षेत्रीयता और राजनीतिक स्वार्थों के चलते हिंदी को शासकीय कार्यों में बाधा का सामना करना पड़ता है।
कुछ राज्यों में जानबूझकर हिंदी के स्थान पर स्थानीय भाषा को थोपने का प्रयास किया जाता है, जबकि संविधान में हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया है। यह विडंबना है कि जो भाषा करोड़ों भारतीयों की आत्मा है, वही राजनीति की भेंट चढ़ जाती है।
हिंदी की वर्तमान प्रासंगिकता
हिंदी साहित्य, सिनेमा, मीडिया और इंटरनेट के माध्यम से आज न सिर्फ भारत, बल्कि पूरी दुनिया में अपनी पहचान बना चुकी है। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स ने इसे नई ऊर्जा दी है।
निष्कर्ष: हिंदी हमारी पहचान
हिंदी दिवस केवल औपचारिक उत्सव नहीं होना चाहिए। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हिंदी हमारी सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है। इसे केवल भाषा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अस्मिता और भारतीय पहचान का आधार मानना होगा।
हिंदी का सम्मान करना यानी अपनी जड़ों का सम्मान करना।



