हाईकोर्ट से तोमर बंधुओं को बड़ी राहत, प्रशासन की बुलडोजर कार्रवाई पर लगी रोक

तोमर बंधुओं के घर पर बुलडोजर कार्रवाई पर लगी रोक, कोर्ट ने कहा- प्रशासन कानून से ऊपर नहीं
बिलासपुर (शिखर दर्शन)// ब्लैकमेलिंग और सूदखोरी के मामले में फरार चल रहे रायपुर के चर्चित तोमर बंधुओं को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। हाईकोर्ट ने उनके आवासीय परिसर में की गई प्रशासनिक कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगाते हुए स्पष्ट किया कि प्रशासन भी कानून से ऊपर नहीं हो सकता और बिना वैध प्रक्रिया के मकान तोड़ने जैसी कार्रवाई मनमानी मानी जाएगी।
मामले की सुनवाई जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की एकल पीठ में हुई। कोर्ट ने नगर निगम की ओर से 31 जुलाई को दिए गए मकान तोड़ने के नोटिस पर स्टे जारी करते हुए कहा कि ऐसी किसी भी कार्रवाई से पहले स्पष्ट कानूनी प्रक्रिया और सक्षम न्यायिक आदेश अनिवार्य है।
प्रशासन का बुलडोजर प्लान और कोर्ट की फटकार
रायपुर निवासी तोमर बंधु लंबे समय से सूदखोरी के अवैध कारोबार में लिप्त बताए जा रहे हैं। प्रशासन ने उनके खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए चल-अचल संपत्तियों को जब्त करने और मकान ध्वस्त करने की योजना बनाई थी। 27 जुलाई को उनके निवास परिसर स्थित कार्यालय पर बुलडोजर चलाया भी गया। इसके बाद नगर निगम ने 31 जुलाई को मकान तोड़ने का नोटिस चस्पा किया था। इसके खिलाफ 29 जुलाई को हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई, जिस पर आज अर्जेंट सुनवाई हुई।
हाईकोर्ट ने मांगी जब्त सामान की फोटोकॉपी
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने तेलीबांधा पुलिस को निर्देश दिया कि जब्त की गई 143 सामग्री की फोटोकॉपी याचिकाकर्ता और नगर निगम को उपलब्ध कराई जाए। बताया गया कि पुलिस ने जून माह में छापेमारी कर दस्तावेजों सहित कई सामग्री जब्त की थी, जिनमें मकान संबंधी कागजात भी शामिल हैं।
याचिकाकर्ताओं की पैरवी और प्रशासन का पक्ष
तोमर बंधुओं की ओर से पूर्व महाधिवक्ता सतीश चंद्र वर्मा और अधिवक्ता सजल गुप्ता ने पैरवी की, जबकि राज्य सरकार, निगम प्रशासन और पुलिस की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता आर.के. गुप्ता ने पक्ष रखा।
कार्यालय में तोड़फोड़ पर मुआवजे की तैयारी
याचिकाकर्ताओं ने कार्यालय में की गई तोड़फोड़ को भी गैरकानूनी ठहराया है और इसके लिए मुआवजे की मांग को लेकर हाईकोर्ट में अलग से याचिका दाखिल करने की बात कही है। वहीं कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपील के लिए याचिकाकर्ताओं को पर्याप्त अवसर दिया जाएगा।
यह फैसला प्रशासन की मनमानी पर लगाम कसते हुए वैधानिक प्रक्रिया के महत्व को दोहराता है और यह संदेश देता है कि कानून के दायरे में रहकर ही कार्रवाई की जानी चाहिए।



