माँ: सृष्टि की मूलधारा और जीवन की सबसे अनमोल व्याख्या

विशेष संपादकीय — मदर्स डे पर

माँ — यह शब्द केवल एक सम्बोधन नहीं, बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड की सबसे प्रथम और सर्वोच्च सत्ता की मूर्त अभिव्यक्ति है। जब सृष्टि का आरंभ हुआ, तो सृजन की भावना के साथ सबसे पहले जन्मी “ममता” थी। यह वही ममता है, जो एक माँ के रूप में इस संसार में सबसे पवित्र, सबसे मजबूत और सबसे कोमल रिश्ता बनाती है।
मनुष्य के जन्म का पहला माध्यम माँ ही होती है। वह शरीर नहीं, चेतना है। माँ न केवल संतान को जन्म देती है, बल्कि उसे जीवन देती है — वह जीवन जो केवल साँसों का सिलसिला नहीं, बल्कि प्रेम, त्याग, तपस्या और निरंतर सेवा से संचित एक अमूल्य उपहार है। कुदरत ने माँ को वह सभी समर्थ शक्तियाँ दी हैं, जो शायद किसी देवता को भी न मिली हो — सहनशीलता, करुणा, असीम प्रेम, और अपने प्राणों से भी अधिक अपनी संतान की रक्षा का भाव।

माँ वात्सल्य की वह निर्झरिणी है, जिसकी गोद में सारा संसार चैन पाता है। वह एक तपस्विनी है, जो अपने स्वप्नों की बलि देकर, अपने सुखों का परित्याग करके अपने बच्चों के लिए जीवन का एक नया मार्ग प्रशस्त करती है। वह अपने जीवन की प्रत्येक साँस को अपनी संतान की मुस्कान में समर्पित कर देती है — बिना किसी अपेक्षा, बिना किसी स्वार्थ।
विपरीत परिस्थितियाँ, अभाव, कष्ट, समाज की विडंबनाएँ — कोई भी संकट माँ को नहीं रोक सकता। चाहे भूख हो या बुखार, सूखा हो या आँधी, माँ अपनी संतान की रक्षा में अडिग रहती है। वह थकती नहीं, हारती नहीं, क्योंकि उसे पता है कि उसकी संतान का एक कदम भी लड़खड़ाना, उसके समर्पण की परीक्षा है।
माँ केवल पालनकर्ता नहीं, एक निर्माता है — वह अपने बच्चों को चरित्र, संस्कार, अनुशासन, मेहनत और संवेदनशीलता का पाठ पढ़ाती है। माँ ही वह पहली गुरु है, जिसकी शिक्षाएं जीवन के हर मोड़ पर संबल बनती हैं। एक सफल और संस्कारी इंसान बनने की नींव माँ की गोद में ही पड़ती है।

जैसे-जैसे व्यक्ति में समझ विकसित होती है, वैसे-वैसे माँ के त्याग और उसकी ममता का वास्तविक बोध होता है। यही वह समय होता है, जब माँ के प्रति कर्तव्यों का बीज मन में अंकुरित होता है। माँ की सेवा, सम्मान और देखभाल जीवन की सर्वोच्च नैतिक जिम्मेदारी है। जो व्यक्ति इस कर्तव्य से विमुख होता है, वह जीवन के मूल उद्देश्य से दूर हो जाता है।
माँ केवल एक व्यक्ति नहीं, एक संस्था है — वह समाज की नींव है। और समाज में उसका स्थान सर्वोच्च होना चाहिए। माँ को केवल “पूजा” नहीं, वास्तविक “सम्मान” की आवश्यकता है — वह सम्मान, जो उसे निर्णयों में भागीदारी दे, उसकी इच्छाओं को सुनने का हक दे, और उसे केवल एक त्याग की मूर्ति न मानकर एक व्यक्ति के रूप में आदर दे।
लेकिन दुर्भाग्यवश आज के सामाजिक परिवेश में माँ की भूमिका संकट में है। परिवारों में बढ़ते कलह, संबंधों में आई संवेदनहीनता, और भौतिकवादी जीवनशैली ने माँ को एकाकी कर दिया है। आज की पीढ़ी अपने सपनों के पीछे भागती हुई माँ की भावनाओं को, उसके अस्तित्व को, उसकी पीड़ा को अनदेखा कर रही है। यह चिंताजनक है कि जिन हाथों ने कभी हमें उठाया, आज वही हाथ खाली रह जाते हैं।
माँ की मर्यादा को पुनः स्थापित करना आज की सबसे बड़ी सामाजिक आवश्यकता है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि माँ केवल हमारे बचपन की जरूरत नहीं, वह हमारे जीवन की नींव है। जब वह अकेली रह जाती है, तब केवल वह नहीं, पूरा समाज खोखला हो जाता है।
इस मदर्स डे पर हमें संकल्प लेना होगा — माँ केवल एक दिन की श्रद्धा का विषय नहीं है, वह हर दिन की सेवा, समझदारी और सम्मान की अधिकारी है। उसकी आँखों में फिर से वही चमक लौटे, उसकी झुर्रियों में फिर से वही आत्मगौरव दिखे — ” यही हमारे जीवन और व्यक्तित्व की सच्ची सार्थकता होगी , और यही उसके प्रति हमारी सच्ची सेवा और सम्मान होगा।“
✍️ लेखक: [ राजेश निर्मलकर , B.J.M.C. (Bachelor of Journalism & Mass Communication), M.M.C.J. (Masters of Mass Communication & Journalism), L.L.B. (Bachelor of Laws) , डायरेक्टर, शिखर दर्शन न्यूज ]



