दुर्ग संभाग

छत्तीसगढ़ का ये गांव अब भी अंधेरे में, जबकि सिर्फ 5 फीट दूर मध्यप्रदेश का गांव जगमगा रहा है

विकास के दावों के बीच अंधेरे में डूबा ग्वालगुंडी गांव: सरहद के इस पार अब भी रौशनी का इंतजार

खैरागढ़ (शिखर दर्शन) // छत्तीसगढ़ में विकास के तमाम दावों और योजनाओं के बीच कुछ गांव ऐसे भी हैं, जो अब तक बुनियादी सुविधाओं के इंतजार में हैं। ऐसा ही एक गांव है – ग्वालगुंडी, जो खैरागढ़ जिले के घने जंगलों के बीच, मध्यप्रदेश की सीमा से सटा हुआ है। सरहद के उस पार रौशनी और तरक्की है, जबकि इस ओर केवल अंधकार, उपेक्षा और इंतजार।

ग्वालगुंडी गांव आज भी बिजली, सड़क और पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं से पूरी तरह वंचित है। यहां के लोग लकड़ियां जलाकर रात का अंधेरा काटते हैं और दिन में तालाबों-नदियों में पानी की तलाश करते हैं। जरूरत की चीजों के लिए उन्हें 15 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। बरसात के मौसम में स्थिति और भी भयावह हो जाती है, जब कीचड़, नदी और उफनते नाले रास्तों को लील लेते हैं। इन रास्तों से गुजरना लोगों की जान जोखिम में डाल देता है।

सरहद के इस पार अंधेरा, उस पार रौशनी

ग्वालगुंडी से महज कुछ फीट की दूरी पर मध्यप्रदेश के डिंडौरी जिले का गांव हर्राटोला है, जिसे मठारी गांव ने गोद लिया है। वहां हर घर तक बिजली की लाइनें पहुंच चुकी हैं, पक्की नहीं तो कच्ची सड़कें हैं और पुल भी बने हैं। गांव के लोग हर सरकारी योजना का लाभ ले रहे हैं, जबकि ग्वालगुंडी के लोग केवल दूर से ये सब देखते रह जाते हैं।

“बच्चों को मशाल की रौशनी में पढ़ाई करनी पड़ती है”

गांव के बुजुर्ग कहते हैं – “हमने कभी अपने घर में बिजली की रौशनी नहीं देखी। इलाज के लिए मीलों पैदल चलना पड़ता है।” वहीं गांव की महिलाओं की पीड़ा और गहरी है – “हमारे सामने ही मध्यप्रदेश के गांव में लोग हर सुविधा का आनंद ले रहे हैं और हम अब भी उसी हाल में जी रहे हैं जैसे शायद आजादी के पहले थे।” यहां के बच्चों ने आज तक टीवी नहीं देखा और बुजुर्गों ने कभी अस्पताल का बिस्तर नहीं।

प्रशासन ने माना – अब नक्सल मुक्त है इलाका

जब इस मुद्दे पर जिला प्रशासन से बात की गई तो एडीएम प्रेम कुमार पटेल ने बताया कि – “ग्वालगुंडी पहाड़ी क्षेत्र में बसा है, पहले यह नक्सली गतिविधियों से प्रभावित था, लेकिन अब यह इलाका नक्सल मुक्त है। आने वाले समय में यहां सड़क, बिजली और पर्यटन सुविधाएं विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है।”

विकास का पैमाना क्या सिर्फ दूरी तय करता है?

यह सवाल अब भी बना हुआ है – जब पांच फीट दूर बसे गांव में हर सुविधा पहुंच सकती है, तो फिर ग्वालगुंडी अब तक क्यों वंचित है? क्या इसका एकमात्र दोष सिर्फ इतना है कि यह बॉर्डर के इस पार है?

यह कहानी सिर्फ ग्वालगुंडी की नहीं है। खैरागढ़ जिले में ऐसे 8 और गांव हैं, जहां बिजली, सड़क और पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं अब तक नहीं पहुंची हैं। सालों से सरकारें बदलती रहीं, वादे होते रहे, लेकिन इन गांवों की तस्वीर नहीं बदली।

यह हकीकत बताती है कि विकास की गाड़ी अब भी हर स्टेशन तक नहीं पहुंची – कुछ गांव आज भी वहीं हैं… अंधेरे में, उपेक्षा में और इंतजार में।

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