सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर उपराष्ट्रपति धनखड़ का बड़ा बयान: क्या न्यायपालिका बन गई है ‘सुपर संसद’ ?

नई दिल्ली (शिखर दर्शन) // भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने एक हालिया सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर गहरी चिंता जताई है और न्यायपालिका की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए हैं। राज्यसभा इंटर्नशिप कार्यक्रम के समापन समारोह में बोलते हुए उन्होंने कहा कि भारत में ऐसा लोकतंत्र कल्पना से परे है, जहां न्यायाधीश कानून बनाएंगे, कार्यपालिका की जिम्मेदारी निभाएंगे और ‘सुपर संसद’ की तरह काम करेंगे।
धनखड़ ने खास तौर पर सुप्रीम कोर्ट के उस ऐतिहासिक आदेश का उल्लेख किया, जिसमें राष्ट्रपति को तीन महीने के भीतर राज्यपाल द्वारा भेजे गए विधेयकों पर निर्णय लेने की समयसीमा तय की गई है। उन्होंने कहा, “हमने उस दिन की कल्पना नहीं की थी जब राष्ट्रपति को तय समय में फैसला लेने को कहा जाएगा और यदि वे निर्णय नहीं लेंगे तो कानून स्वत: बन जाएगा।”
धनखड़ ने अपने संबोधन में ज्यूडिशियल ओवररीच और एक्टिविज्म पर भी तीखा प्रहार करते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 142 को कुछ जज ‘24 घंटे उपलब्ध परमाणु मिसाइल’ की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “अब जज विधायी विषयों पर फैसला कर रहे हैं, कार्यपालिका की भूमिका निभा रहे हैं और उनकी कोई जवाबदेही नहीं है। यह लोकतंत्र की आत्मा के विपरीत है।”
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला क्या है ?
दरअसल, 8 अप्रैल 2025 को तमिलनाडु सरकार बनाम राज्यपाल मामले में सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने फैसला दिया था कि अगर कोई विधेयक राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के विचारार्थ भेजा जाता है, तो राष्ट्रपति को तीन महीने के भीतर उस पर निर्णय लेना होगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि विधेयक की संवैधानिकता को लेकर संदेह हो, तो राष्ट्रपति अनुच्छेद 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट से राय ले सकते हैं।
कोर्ट ने अनुच्छेद 201 की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि भले ही संविधान में कोई स्पष्ट समयसीमा न हो, फिर भी ऐसी शक्तियों का प्रयोग “उचित समय” के भीतर होना चाहिए। यही वह निर्देश है जिसे लेकर उपराष्ट्रपति ने असहमति प्रकट की है।
शक्ति संतुलन की बहस तेज
धनखड़ का यह बयान ऐसे समय आया है जब देश में कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन की बहस एक बार फिर गर्म हो गई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह न्यायपालिका के अधिकारों के विरोधी नहीं हैं, लेकिन संवैधानिक सीमाओं का पालन सभी संस्थाओं पर समान रूप से लागू होना चाहिए।
उन्होंने चेताया कि यदि न्यायपालिका अपनी सीमाओं से बाहर जाकर कार्यपालिका और विधायिका की भूमिका निभाने लगेगी तो लोकतंत्र की नींव डगमगाने लगेगी। उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र केवल अधिकारों का ही नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों और संतुलन का भी नाम है।
राजनीतिक और कानूनी हलकों में गूंज
धनखड़ की टिप्पणी से न केवल सियासी गलियारों में हलचल मच गई है, बल्कि यह बयान न्यायिक हलकों और संविधानविदों के बीच भी बहस का विषय बन गया है। कई विशेषज्ञ इसे लोकतंत्र में आवश्यक शक्ति संतुलन की बहस के लिए एक जरूरी पहल बता रहे हैं, वहीं कुछ इसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप के रूप में देख रहे हैं।
निष्कर्ष: क्या मर्यादा लांघ रही है न्यायपालिका ?
इस बहस का केंद्र यही सवाल है—क्या भारत की न्यायपालिका संविधान द्वारा प्रदत्त सीमाओं का अतिक्रमण कर रही है? उपराष्ट्रपति का यह बयान लोकतंत्र के तीनों स्तंभों के बीच मर्यादा और अधिकारों को लेकर न केवल चेतावनी है, बल्कि एक बड़े संवैधानिक विमर्श की शुरुआत भी है।
अब देखना यह है कि इस संवैधानिक बहस की परिणति क्या होती है—क्या न्यायपालिका आत्मावलोकन करेगी, या फिर यह टकराव लोकतंत्र की दिशा को किसी नए मोड़ पर ले जाएगा ?



