इजराइली हमले में जिंदा जल गए फिलिस्तीनी पत्रकार अहमद मंसूर

गाजा // इजराइल और हमास के बीच जारी संघर्ष में एक बार फिर पत्रकारिता सबसे बड़ा निशाना बनी है। सोमवार को दक्षिणी गाजा के खान यूनिस क्षेत्र में इजराइली हवाई हमले में फिलिस्तीनी पत्रकार अहमद मंसूर की दर्दनाक मौत हो गई। चश्मदीदों के मुताबिक, मंसूर आग की लपटों से घिरे हुए कुर्सी पर बैठे हुए चीखते रहे, लेकिन कोई उन्हें बचा नहीं सका। उनकी मौत का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है, जिसे देखकर हर आंख नम हो गई।
वीडियो फुटेज में देखा जा सकता है कि मंसूर आग से झुलसते हुए मदद की गुहार लगाते हैं, वहीं आसपास मौजूद लोग जान बचाने की कोशिश करते नजर आते हैं। इस हमले में कुल दो पत्रकारों की मौत और आठ पत्रकार घायल हुए हैं।
पत्रकारों पर हमला या युद्ध का बहाना?
इजराइली सेना ने इस हमले की पुष्टि करते हुए दावा किया कि उनका निशाना पत्रकार हसन एल्स्लेयेह था, जिस पर 7 अक्टूबर 2023 को इजराइल पर हुए हमलों में शामिल होने का आरोप है। हालांकि इस हमले में एल्स्लेयेह घायल हुआ, लेकिन पत्रकार अहमद मंसूर की जलकर मौत हो गई। इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या इजराइली सेना पत्रकारों को जानबूझकर निशाना बना रही है ?
ऑनेस्ट रिपोर्टिंग नामक इजराइल समर्थक संस्था ने हसन एल्स्लेयेह की हमास नेता याह्या सिनवार के साथ एक पुरानी तस्वीर जारी की थी, जिसके बाद CNN, रॉयटर्स और एपी जैसी अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थाओं ने उससे अपना अनुबंध समाप्त कर दिया था।
पत्रकारों की लगातार हो रही मौतें
गाजा स्थित अधिकारियों के अनुसार, 2023 में इजराइल-हमास युद्ध की शुरुआत के बाद से अब तक 211 से अधिक फिलिस्तीनी पत्रकार मारे जा चुके हैं। वहीं, रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स और पत्रकार सुरक्षा समिति (CPJ) जैसी संस्थाओं ने इस घटना की कड़ी निंदा करते हुए इजराइल पर अंतरराष्ट्रीय कानूनों के उल्लंघन और पत्रकारों को बार-बार निशाना बनाने का गंभीर आरोप लगाया है।
गाजा में तबाही की तस्वीर
संघर्ष के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। 25 मार्च 2025 तक के आंकड़ों के अनुसार, इजराइल-हमास युद्ध में 50,000 से ज्यादा फिलिस्तीनियों की मौत हो चुकी है और 1,13,000 से अधिक घायल हुए हैं। सीजफायर की कई कोशिशों के बावजूद, 18 मार्च को फिर से हमले शुरू हुए जिनमें केवल तीन दिनों में 700 से अधिक लोगों की मौत और 3,400 से ज्यादा लोग घायल हो गए।
क्या पत्रकारिता अब सबसे बड़ा अपराध है ?
अहमद मंसूर की जिंदा जलने की यह घटना न केवल एक व्यक्ति की मौत है, बल्कि यह सवाल भी है कि क्या आज की दुनिया में सच्चाई दिखाना ही सबसे बड़ा खतरा बन गया है? जब अंतरराष्ट्रीय मीडिया के कैमरे भी युद्ध की भयावहता से नहीं बच पा रहे हैं, तो आम नागरिकों की सुरक्षा की उम्मीद किससे की जाए ?



