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40 साल बाद आया सुप्रीम कोर्ट का फैसला: बलात्कार साबित करने के लिए शारीरिक चोट आवश्यक नहीं

नई दिल्ली (शिखर दर्शन) // सुप्रीम कोर्ट ने 40 साल पुराने बलात्कार के मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि बलात्कार को साबित करने के लिए पीड़िता के प्राइवेट पार्ट पर चोट के निशान होना अनिवार्य नहीं है। कोर्ट ने कहा कि अन्य परिस्थितिजन्य और ठोस साक्ष्यों के आधार पर भी दोष सिद्ध किया जा सकता है।

क्या है पूरा मामला ?

यह मामला 1984 का है, जब एक ट्यूशन शिक्षक पर अपनी छात्रा के साथ बलात्कार करने का आरोप लगा था। आरोप के अनुसार, आरोपी ने 19 मार्च 1984 को ट्यूशन पढ़ाने के दौरान दो अन्य छात्राओं को बाहर भेजकर पीड़िता का यौन उत्पीड़न किया। जब बाहर खड़ी छात्राओं ने दरवाजा खटखटाया, तो शिक्षक ने दरवाजा नहीं खोला। कुछ समय बाद, पीड़िता की दादी मौके पर पहुंचीं और लड़की को बाहर निकाला।

परिवार ने जब पुलिस में शिकायत दर्ज कराने की कोशिश की, तो आरोपी के समर्थकों ने उन्हें धमकाया। इसके बावजूद कुछ समय बाद एफआईआर दर्ज कर ली गई।

40 साल की कानूनी प्रक्रिया

इस मामले में 1986 में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी करार दिया, जिसके बाद मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा। हाईकोर्ट को ट्रायल कोर्ट के फैसले की पुष्टि करने में 26 साल का समय लग गया। इसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की, जहां निर्णय आने में 15 और वर्ष लग गए।

सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां

जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस प्रसन्ना बी की बेंच ने आरोपी के इस तर्क को खारिज कर दिया कि चूंकि मेडिकल रिपोर्ट में पीड़िता के प्राइवेट पार्ट पर चोट के निशान नहीं थे, इसलिए बलात्कार साबित नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हर बलात्कार पीड़िता के शरीर पर चोट के निशान हों, यह आवश्यक नहीं है। बलात्कार की पुष्टि अन्य साक्ष्यों और परिस्थितिजन्य प्रमाणों से भी की जा सकती है।

बेंच ने आरोपी के इस दावे को भी खारिज कर दिया कि पीड़िता की मां ने उसे फंसाने के लिए झूठा मामला दर्ज कराया। कोर्ट ने कहा कि इस आरोप का कोई ठोस आधार नहीं है।

फैसले का व्यापक प्रभाव

यह निर्णय उन मामलों के लिए महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है, जहां मेडिकल रिपोर्ट में चोट के निशान नहीं मिलने पर बलात्कार के आरोपों को कमजोर करने की कोशिश की जाती है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बलात्कार पीड़िता के बयान और अन्य साक्ष्यों को समान रूप से महत्वपूर्ण माना जाएगा।

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